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UP Board Class 8 Hindi Chapter 6 बिहारी के दोहे Solution | व्याख्या, प्रश्न उत्तर

UP Board Class 8 Hindi Chapter 6 बिहारी के दोहे Solution

|| UP BOARD CLASS 8 HINDI SOLUTION ||

UP Board Class 8 Hindi Chapter 6 “बिहारी के दोहे” रीतिकालीन कवि बिहारी लाल की नीति और भक्ति प्रधान रचनाओं का संग्रह है। इस अध्याय में जीवन-मूल्य, सद्गुण, उपयोगिता और ईश्वर भक्ति से जुड़े महत्वपूर्ण संदेश दिए गए हैं। इस पोस्ट में आपको सप्रसंग विस्तृत व्याख्या, शब्दार्थ, प्रश्न उत्तर तथा व्याकरण खण्ड परीक्षा उपयोगी रूप में प्राप्त होंगे। यदि आप UP Board Class 8 Hindi Chapter 6 बिहारी के दोहे Solution खोज रहे हैं, तो यह लेख आपके लिए पूर्ण मार्गदर्शक है।

UP Board Class 8 Hindi Chapter 6 बिहारी के दोहे Solution:
यहाँ आपको पाठ “बिहारी के दोहे” की सप्रसंग व्याख्या, शब्दार्थ, अभ्यास प्रश्न उत्तर और व्याकरण एक ही स्थान पर सरल एवं परीक्षा उपयोगी भाषा में मिलेगा।
BASIC SHIKSHA SOLUTION ● UPBOARD CLASS 8 HINDI SOLUTION

कवि परिचय : कविवर बिहारी

  • जन्म: सन् 1595 ई० (ग्वालियर के पास वसुआ, गोविन्दपुर ग्राम में)
  • विशेषता: ये जयपुर नरेश महाराजा जयसिंह के दरबारी कवि थे। महाराज इनके प्रत्येक दोहे पर एक स्वर्ण मुद्रा (सोने का सिक्का) भेंट करते थे।
  • प्रमुख रचना: इनकी एकमात्र और विश्व प्रसिद्ध रचना 'बिहारी सतसई' है, जिसमें शृंगार, नीति और भक्ति का अद्भुत संगम है।
  • निधन: सन् 1663 ई०
सन्दर्भ (Context - सम्पूर्ण पाठ हेतु):

प्रस्तुत दोहे हमारी पाठ्यपुस्तक 'मंजरी' के 'बिहारी के दोहे' नामक पाठ से संकलित हैं। इसके रचयिता रीतिकाल के महान कवि बिहारी लाल जी हैं। इन दोहों में कवि ने नैतिक, व्यावहारिक और भक्ति सम्बन्धी उच्च जीवन-मूल्यों का अत्यंत सुंदर वर्णन किया है।

BASIC SHIKSHA SOLUTION ● EXPLANATION
नीति के दोहे (सप्रसंग विस्तृत व्याख्या)
दोहा (1)
बड़े न हूजै गुनन बिन, विरद-बड़ाई पाय।
कहत धतूरे सों कनक, गहनों गढ्यौ न जाय।।
प्रसंग:

इस दोहे में कवि ने गुणों के महत्व को दर्शाते हुए बताया है कि केवल नाम बड़ा रख लेने से कोई व्यक्ति महान नहीं हो जाता।

भावार्थ:

बिना श्रेष्ठ गुणों के, केवल नाम की बड़ाई (यश) पा लेने से कोई व्यक्ति बड़ा (महान) नहीं बन जाता।

विस्तृत व्याख्या:

कवि बिहारी जी अत्यंत सरल उदाहरण देते हुए समझाते हैं कि जिस प्रकार 'धतूरे' का एक नाम 'कनक' (स्वर्ण/सोना) भी है, परन्तु नाम समान होने पर भी धतूरे से आभूषण (गहने) नहीं बनाए जा सकते क्योंकि उसमें सोने वाले श्रेष्ठ गुण नहीं होते। ठीक उसी प्रकार, किसी व्यक्ति का नाम चाहे कितना भी महान क्यों न रख दिया जाए, यदि उसके भीतर सद्गुण और उत्तम चरित्र नहीं है, तो वह समाज में महानता प्राप्त नहीं कर सकता। महानता श्रेष्ठ कर्मों से मिलती है, केवल नाम से नहीं।

दोहा (2)
अति अगाध, अति ओथरो, नदी, कूप, सर बाइ।
सो ताकौ सागर जहाँ, जाकी प्यास बुझाइ ।।
प्रसंग:

इस दोहे में कवि ने स्पष्ट किया है कि वस्तु की महत्ता उसके आकार में नहीं, बल्कि उसकी उपयोगिता में होती है।

भावार्थ:

नदी, कुआँ, तालाब या बावली (बाइ) चाहे अत्यधिक गहरे (अगाध) हों या उथले (ओथरे), जिससे किसी प्यासे की प्यास बुझ जाए, वही उसके लिए समुद्र के समान महान है।

विस्तृत व्याख्या:

कवि कहते हैं कि संसार में जल के अनेक स्रोत हैं। कोई बहुत गहरा है तो कोई बहुत कम गहरे जल वाला (उथला) है। परन्तु एक प्यासे व्यक्ति के लिए विशाल समुद्र का खारा जल किसी काम का नहीं होता। यदि एक छोटा सा कुआँ या बावली उस प्यासे व्यक्ति की प्यास शांत कर दे, तो उस व्यक्ति के लिए वह छोटा कुआँ ही विशाल सागर के समान है। अभिप्राय यह है कि जो वस्तु या व्यक्ति समय पर हमारे कार्य सिद्ध (पूर्ण) कर दे, वही हमारे लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण और महान है।

दोहा (3)
ओछे बड़े न ह्वै सकें, लगौं सतर ह्वै गैन।
दीरघ होहिं न नैकहूँ, फारि निहारै नैन।।
प्रसंग:

यहाँ कवि ने तुच्छ (नीच) प्रवृत्ति वाले व्यक्तियों के दिखावे और अहंकार पर कटाक्ष किया है।

भावार्थ:

मनुष्य अपने गुणों और स्वभाव से बड़ा होता है, केवल अहंकार या दिखावे से कोई महान नहीं बन सकता। तुच्छ या छोटे विचार वाले लोग चाहे जितना दिखावा कर लें, वे महान नहीं बन सकते।

विस्तृत व्याख्या:

कवि बिहारी यहाँ एक मनोवैज्ञानिक सत्य को उद्घाटित कर रहे हैं। वे कहते हैं कि जिस व्यक्ति के विचार और संस्कार छोटे (ओछे) हैं, वह यदि अहंकारवश खुद को 'सतर' (तनकर खड़ा होना) कर ले या आकाश (गैन) की ऊँचाइयों को छूने का स्वांग रचे, तो भी उसे 'दीर्घ' यानी महान नहीं माना जा सकता। इसे स्पष्ट करने के लिए कवि कहते हैं कि जिस प्रकार आँखें फाड़-फाड़कर देखने से आँखें वास्तव में बड़ी (विशाल) नहीं हो जातीं, उसी प्रकार झूठा दिखावा करने या अहंकार से तनकर चलने से किसी तुच्छ व्यक्ति को समाज में बड़प्पन और सम्मान प्राप्त नहीं हो सकता।

दोहा (4)
कनक कनक तै सौगुनी, मादकता अधिकाय।
उहि खाये बौराय जग, इहिं पाये बौराय।।
प्रसंग:

इस अत्यंत प्रसिद्ध दोहे में कवि ने धन-सम्पत्ति के अहंकार को अत्यंत विषैला और नशीला बताया है।

भावार्थ:

सोने (स्वर्ण) में धतूरे की अपेक्षा सौ गुना अधिक मादकता (नशा) होता है। धतूरे को तो खाने पर व्यक्ति पागल होता है, परन्तु स्वर्ण (धन) को तो केवल प्राप्त कर लेने से ही व्यक्ति पागल (अहंकारी) हो जाता है।

विस्तृत व्याख्या:

कवि बिहारी जी कहते हैं कि संसार में 'कनक' (धतूरा) को एक नशीला पदार्थ माना जाता है। परन्तु दूसरे 'कनक' अर्थात् स्वर्ण (धन-दौलत) में धतूरे से भी सौ गुना अधिक भयंकर नशा होता है। कारण यह है कि धतूरे का नशा तो उसे खाने के बाद चढ़ता है और मनुष्य अपना मानसिक संतुलन खोता है, जबकि धन-सम्पत्ति का नशा इतना तीव्र होता है कि उसे बिना खाए, केवल पा लेने (अधिकार में आ जाने) मात्र से ही मनुष्य अहंकार में अंधा (पागल) हो जाता है और उचित-अनुचित का भेद भूल जाता है।

दोहा (5)
दिन दस आदरु पाइकै, करि लै आपु बखानु।
जौ लगि काग ! सराध पखु, तौ लगि तौ सनमानु।।
प्रसंग:

इस दोहे में कौए के माध्यम से अवसरवादी सम्मान और मूर्खों के व्यर्थ अहंकार का वर्णन किया गया है।

भावार्थ:

कवि कौए को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि हे कौए! तुम कुछ दिनों का आदर पाकर अपनी व्यर्थ प्रशंसा कर लो, क्योंकि तुम्हारा सम्मान केवल श्राद्ध पक्ष तक ही सीमित है।

विस्तृत व्याख्या:

भारतीय परम्परा में 'श्राद्ध पक्ष' (पितृपक्ष) के पंद्रह दिनों में पितरों के निमित्त कौओं को भोजन कराया जाता है और उन्हें आदर से बुलाया जाता है। कवि इसी बात का दृष्टांत देते हुए कहते हैं कि हे काक (कौए)! इस थोड़े समय के सम्मान पर तुम अपनी झूठी प्रशंसा मत करो। जैसे ही यह श्राद्ध पक्ष समाप्त होगा, तुम्हें कोई नहीं पूछेगा और तुम्हें फिर से दुत्कार दिया जाएगा। ठीक इसी प्रकार, संसार में किसी तुच्छ या दुर्जन व्यक्ति को यदि किसी विशेष अवसर या स्वार्थवश सम्मान मिल जाए, तो उसे स्वयं पर अहंकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि कार्य पूर्ण होते ही उसका वह सम्मान समाप्त हो जाएगा।

भक्ति के दोहे (सप्रसंग विस्तृत व्याख्या)
दोहा (6)
बन्धु भये का दीन कै, को तार्यों रघुराइ।
तूठे तूठे फिरत हौ, झूठे विरद कहाइ।।
प्रसंग:

इस दोहे में कवि ने भगवान श्रीराम को एक मीठा उलाहना (उपालम्भ) देते हुए अपने उद्धार की प्रार्थना की है।

भावार्थ:

हे रघुनाथ! आप दीनों (असहायों) के बंधु कहलाते हैं, परन्तु आपने वास्तव में किस दीन का उद्धार किया है? आप तो व्यर्थ ही झूठा यश पाकर प्रसन्न हो रहे हैं।

विस्तृत व्याख्या:

भक्त अपने आराध्य श्रीराम से प्रेमपूर्ण शिकायत करते हुए कहता है कि हे प्रभु! सारा संसार आपको 'दीनबंधु' (दीनों का रक्षक) और 'पतित-पावन' कहता है, और आप भी इस प्रशंसा (झूठे यश) को सुनकर अत्यंत प्रसन्न (तूठे-तूठे) होते हैं। परन्तु यह आपका सच्चा यश तब तक नहीं कहलाएगा, जब तक आप मुझ जैसे सबसे बड़े पापी और असहाय का उद्धार (कल्याण) नहीं कर देते। जब आप मेरा उद्धार करेंगे, तभी आपका यह यश सच्चा सिद्ध होगा।

दोहा (7)
मोहन मूरति स्याम की, अति अद्भुत गति जोइ।
बसतु सुचित-अन्तर तऊ, प्रतिबिम्बितु जग होइ ।।
प्रसंग:

यहाँ श्रीकृष्ण के मनमोहक रूप की महिमा और उनके हृदय में बसने से होने वाले अलौकिक प्रभाव का वर्णन है।

भावार्थ:

श्रीकृष्ण की उस सांवली और मनमोहक मूर्ति की गति अत्यंत अद्भुत है। यद्यपि वह शुद्ध हृदय के भीतर निवास करती है, फिर भी उससे सम्पूर्ण संसार प्रकाशित (प्रतिबिंबित) हो उठता है।

विस्तृत व्याख्या:

कवि कहते हैं कि प्रभु श्रीकृष्ण का श्याम-वर्ण स्वरूप बड़ा ही विचित्र और चमत्कारी है। सामान्यतः कोई वस्तु यदि किसी बंद स्थान में रख दी जाए, तो वह बाहर नहीं दिखती। परन्तु जब प्रभु की यह सुंदर छवि भक्त के पवित्र हृदय (सुचित-अन्तर) में बस जाती है, तो उसकी दिव्य आभा से हृदय इतना स्वच्छ और दर्पण के समान निर्मल हो जाता है कि उस शुद्ध हृदय में संपूर्ण संसार का यथार्थ रूप प्रतिबिंबित होने लगता है। आशय यह है कि ईश्वर के हृदय में बसने से मनुष्य को समस्त संसार में परमात्मा के ही दर्शन होने लगते हैं।

दोहा (8)
भजन कह्यौ, ताते भज्यौ, भज्यौ न एकौ बार।
दूरि भजन जातें कह्यौ, सौ तैं भज्यौ गँवार ।।
प्रसंग:

इस दोहे में कवि ने मनुष्य की अज्ञानता और सांसारिक मोह-माया में भटकने की प्रवृत्ति पर गहरा व्यंग्य किया है।

भावार्थ:

हे मूर्ख मन! सद्गुरु ने तुझे जिस ईश्वर का स्मरण (भजन) करने को कहा, तू उससे दूर भाग गया (भज्यौ) और एक बार भी उसका भजन नहीं किया। और जिन सांसारिक बुराइयों से दूर भागने को कहा, तूने उन्हीं को अपना लिया।

विस्तृत व्याख्या:

कवि बिहारी जी अज्ञानी मनुष्य को फटकारते हुए कहते हैं कि हे गँवार (मूर्ख) मनुष्य! ज्ञानी गुरुजनों ने तुझे जिस परमात्मा का गुणगान और स्मरण (भजन) करने का उपदेश दिया था, तू अज्ञानतावश उसी सच्चे मार्ग से दूर भाग गया (भज्यौ) और तूने जीवन में एक बार भी सच्चे मन से प्रभु का नाम नहीं लिया। इसके विपरीत, जिन सांसारिक दुर्गुणों, विषय-वासनाओं और पापों से तुझे दूर रहने (भागने) का उपदेश दिया गया था, तूने अज्ञान में फँसकर उन्हीं बुराइयों का सेवन (भजन) किया। यह मनुष्य की सबसे बड़ी विडंबना है।

BASIC SHIKSHA SOLUTION ● WORD MEANINGS
1. शब्दार्थ (Word Meanings)
शब्द अर्थ शब्द अर्थ
विरदयश / कीर्ति / बड़ाईगैनगगन / आकाश
ओथरोउथला (कम गहरा)दीरघबड़ा / विशाल
बाइबापी / बावली (छोटा तालाब)सराध पखुश्राद्ध पक्ष (पितृपक्ष)
सतरऐंठकर / तनकरतूठेप्रसन्न होना
लगौंछूने लगेतातेउससे
नैकहूँथोड़ा सा भीभज्यौभागना / अथवा स्मरण करना
BASIC SHIKSHA SOLUTION ● QUESTION & ANSWERS
2. विचार और कल्पना
प्रश्न 1: 'धतूरे' की अपेक्षा 'सोने' को अधिक मादक क्यों कहा गया है ?
उत्तर: धतूरे को तो खाने के पश्चात व्यक्ति का मानसिक संतुलन बिगड़ता है (उसे नशा होता है), परन्तु सोने (धन-सम्पत्ति) में इतनी अधिक मादकता होती है कि इसे बिना खाए, केवल पा लेने (अधिकार कर लेने) मात्र से ही मनुष्य अहंकार के नशे में अंधा हो जाता है। इसलिए सोने को धतूरे से अधिक मादक कहा गया है।
प्रश्न 2: नीति के दोहों में कोई न कोई मूल्य छिपा होता है। निम्नलिखित मूल्यों से सम्बन्धित दोहों को ढूँढ़कर लिखिए -
  • (क) दिखावा करने से बड़प्पन नहीं आता।
    दोहा: ओछे बड़े न ह्वै सकें, लगौं सतर ह्वै गैन। दीरघ होहिं न नैकहूँ, फारि निहारै नैन।।
  • (ख) स्वयं अपनी प्रशंसा नहीं करनी चाहिए।
    दोहा: दिन दस आदरु पाइकै, करि लै आपु बखानु। जौ लगि काग ! सराध पखु, तौ लगि तौ सनमानु।।
  • (ग) जिस वस्तु से हमारा कार्य सिद्ध हो, वही महत्त्वपूर्ण है।
    दोहा: अति अगाध, अति ओथरो, नदी, कूप, सर बाइ। सो ताकौ सागर जहाँ, जाकी प्यास बुझाइ ।।
  • (घ) गुण, सौन्दर्य से अधिक महत्त्वपूर्ण है।
    दोहा: बड़े न हूजै गुनन बिन, विरद-बड़ाई पाय। कहत धतूरे सों कनक, गहनों गढ्यौ न जाय।।
BASIC SHIKSHA SOLUTION ● TEXTBOOK EXERCISE
3. कविता से (अभ्यास प्रश्नोत्तर)
प्रश्न 1: 'नाम बड़ा होने से ही कोई बड़ा नहीं हो जाता' इस कथन की पुष्टि के लिए कवि ने कौन - सा उदाहरण दिया है?
उत्तर: इस कथन की पुष्टि के लिए कवि ने 'धतूरे और कनक (स्वर्ण)' का उदाहरण दिया है। धतूरे का एक नाम कनक होने पर भी उससे आभूषण (गहने) नहीं गढ़े जा सकते, क्योंकि उसमें सोने वाले गुण नहीं होते।
प्रश्न 2: कवि ने नदी, कूप, सर, बावली को किस स्थिति में सागर के समान माना है?
उत्तर: कवि ने नदी, कुएं, तालाब आदि को उस स्थिति में विशाल सागर के समान माना है, जब वे किसी प्यासे व्यक्ति की प्यास बुझा देते हैं (अर्थात जब वे किसी की आवश्यकता पूर्ण कर देते हैं)।
प्रश्न 3: 'छोटे बड़े नहीं हो सकते' इसके लिए कौन-सा उदाहरण दिया गया है ?
उत्तर: इसके लिए कवि ने आँख का उदाहरण देते हुए बताया है कि जिस प्रकार आँखें फाड़कर (तानकर) देखने से आँखें वास्तव में बड़ी नहीं हो जातीं, उसी प्रकार तुच्छ (छोटे) व्यक्ति के अहंकारपूर्ण दिखावे से वह महान नहीं हो जाता।
प्रश्न 4: कृष्ण की मोहन मूरति क्यों अद्भुत है ?
उत्तर: कृष्ण की मोहन मूरति इसलिए अद्भुत है क्योंकि जब वह भक्त के पवित्र हृदय के भीतर निवास करती है, तब वह बाहर के सम्पूर्ण जगत को अपने दिव्य प्रकाश से प्रकाशित (प्रतिबिंबित) कर देती है।
प्रश्न 5: पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिए -
  • (क) सो ताकौ सागर जहाँ, जाकी प्यास बुझाइ।
    भाव: जिस स्रोत (नदी, कुआँ आदि) से किसी की प्यास शांत हो जाए, वही उसके लिए समुद्र के समान महान है। उपयोगिता ही महानता का आधार है।
  • (ख) दूरि भजन जातें कह्यौ, सौ तैं भज्यौ गँवार।
    भाव: गुरु ने जिन सांसारिक बुराइयों और पापों से दूर भागने (बचने) को कहा था, हे मूर्ख मनुष्य! तूने अज्ञानतावश उन्हीं बुराइयों को अपना लिया (उसी का भजन किया)।
  • (ग) तूठे तूठे फिरत हौ, झूठे विरद कहाइ।
    भाव: भक्त उलाहना देते हुए कहता है कि हे प्रभु! आप तो केवल 'दीनबंधु' कहलाकर झूठा यश प्राप्त करके ही प्रसन्न हो रहे हैं, जब तक मेरा उद्धार नहीं करते, यह यश सच्चा नहीं है।
BASIC SHIKSHA SOLUTION ● GRAMMAR NOTES
4. भाषा की बात (व्याकरण खण्ड)
प्रश्न 1: कविता में प्रयुक्त निम्नलिखित शब्दों को देखिए और उनके खड़ी बोली के रूप पर ध्यान दीजिए। सो = वह, ताकौ = उसके लिए, ह्वै सकें = हो सके। नीचे लिखे शब्दों के खड़ी बोली रूप लिखिए - (तऊ, ताते, जातैं, कह्यौ)
ब्रजभाषा (कविता के शब्द)खड़ी बोली (शुद्ध हिंदी) रूप
तऊतो भी / तब भी
तातेउससे
जातैंजिससे / जिन (बुराइयों) से
कह्यौकहा गया / कहा था
प्रश्न 2: यमक अलंकार पहचानें:
व्याकरण ज्ञान (यमक अलंकार की परिभाषा):

काव्य में जहाँ एक ही शब्द दो या दो से अधिक बार आए, परन्तु प्रत्येक बार उसका अर्थ भिन्न (अलग-अलग) हो, वहाँ 'यमक अलंकार' होता है।

नीचे लिखी पंक्तियों में अलंकार स्पष्ट कीजिए-
  • (क) भजन कह्यौ, ताते भज्यौ, भज्यौ न एकौ बार। दूरि भजन जातें कह्यौ, सौ तैं भज्यौ गँवार ।।
    स्पष्टीकरण: यहाँ 'भज्यौ' और 'भजन' शब्द कई बार आए हैं और उनके अर्थ अलग हैं। एक 'भज्यौ' का अर्थ है भाग जाना (दूर होना) और दूसरे का अर्थ है स्मरण करना (भजन करना)। अतः यहाँ यमक अलंकार है।
  • (ख) 'इस धरा का इस धरा पर ही धरा रह जायेगा।'
    स्पष्टीकरण: यहाँ 'धरा' शब्द कई बार आया है। पहली 'धरा' का अर्थ है पृथ्वी, और दूसरी 'धरा' का अर्थ है रखा होना। अतः यमक अलंकार है।
  • (ग) 'काली घटा का घमण्ड घटा।'
    स्पष्टीकरण: यहाँ 'घटा' शब्द दो बार आया है। पहली 'घटा' का अर्थ है बादल (काले बादल) और दूसरी 'घटा' का अर्थ है कम होना (घट जाना)। अतः यहाँ यमक अलंकार है।
BASIC SHIKSHA SOLUTION ● EXTRA KNOWLEDGE
इसे भी जानें (Extra Knowledge)

🌟 महत्वपूर्ण तथ्य (भारतीय संविधान)

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार भारत संघ की राजभाषा हिन्दी तथा लिपि देवनागरी है।
अन्य अध्याय देखें – Class 8 Hindi
निष्कर्ष
उत्तर: इस प्रकार UP Board Class 8 Hindi Chapter 6 बिहारी के दोहे Solution में हमने सभी दोहों की सप्रसंग व्याख्या, शब्दार्थ, अभ्यास प्रश्न उत्तर एवं व्याकरण विस्तार से प्रस्तुत किया। यह सामग्री विद्यार्थियों की परीक्षा तैयारी के लिए अत्यंत उपयोगी है।
FAQs – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न: बिहारी के दोहे पाठ किस कक्षा में है?
उत्तर: यह पाठ UP Board Class 8 Hindi में शामिल है।
प्रश्न: बिहारी के दोहे के रचयिता कौन हैं?
उत्तर: इस पाठ के रचयिता रीतिकाल के प्रसिद्ध कवि बिहारी लाल हैं।
प्रश्न: इस पाठ में मुख्य रूप से क्या सिखाया गया है?
उत्तर: इस पाठ में नीति, सद्गुण, उपयोगिता और भक्ति से संबंधित जीवन-मूल्य सिखाए गए हैं।
प्रश्न: UP Board Class 8 Hindi Chapter 6 बिहारी के दोहे Solution कहाँ मिलेगा?
उत्तर: Basic Shiksha Solution पर इस अध्याय का सम्पूर्ण समाधान उपलब्ध है।
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निष्कर्ष
उत्तर: इस प्रकार UP Board Class 8 Hindi Chapter 6 बिहारी के दोहे Solution में हमने सभी दोहों की सप्रसंग व्याख्या, शब्दार्थ, अभ्यास प्रश्न उत्तर एवं व्याकरण विस्तार से प्रस्तुत किया। यह सामग्री विद्यार्थियों की परीक्षा तैयारी के लिए अत्यंत उपयोगी है।
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