UP Board Class 8 Hindi Chapter 5 अपराजिता Solution | प्रश्न उत्तर
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UP Board Class 8 Hindi Chapter 5 अपराजिता Solution
UP Board Class 8 Hindi Chapter 5 “अपराजिता” एक प्रेरणादायक पाठ है जिसमें अदम्य साहस, आत्मनिर्भरता और संघर्ष की प्रेरक कहानी प्रस्तुत की गई है। इस पोस्ट में आपको इस अध्याय का विस्तृत सारांश, शब्दार्थ, अभ्यास प्रश्न उत्तर तथा व्याकरण खण्ड सरल भाषा में मिलेगा। यदि आप UP Board Class 8 Hindi Chapter 5 अपराजिता Solution खोज रहे हैं, तो यह लेख आपकी परीक्षा तैयारी के लिए अत्यंत उपयोगी है।
यहाँ आपको “अपराजिता” पाठ का सारांश, शब्दार्थ, प्रश्न उत्तर और व्याकरण एक ही स्थान पर सरल एवं परीक्षा उपयोगी रूप में मिलेगा।
लेखिका परिचय : गौरा पन्त 'शिवानी'
- जन्म: 17 अक्टूबर सन् 1923 ई० (राजकोट, गुजरात)
- विशेषता: हिन्दी की अत्यन्त लोकप्रिय कथा लेखिका। इन्हें साहित्य में 'पद्मश्री' पुरस्कार प्राप्त हुआ।
- प्रमुख रचनाएँ: 'कृष्णकली', 'चैदह फेरे', 'पाताल भैरवी', 'श्मशान चम्पा', 'कैंजा', 'यात्रिक'।
- निधन: 21 मार्च सन् 2003 ई०
प्रस्तुत प्रेरणादायक रेखाचित्र हमारी पाठ्यपुस्तक 'मंजरी' के 'अपराजिता' नामक पाठ से लिया गया है। इसकी रचयिता सुप्रसिद्ध लेखिका गौरा पन्त 'शिवानी' जी हैं।
प्रसंग (Theme):इस पाठ में एक दिव्यांग (शारीरिक रूप से अक्षम) लड़की के अदम्य साहस, विलक्षण प्रतिभा और जीवन जीने की असीम इच्छाशक्ति का अत्यंत मार्मिक वर्णन किया गया है। यह पाठ हमें सिखाता है कि दृढ़ संकल्प से विपरीत परिस्थितियों पर भी विजय प्राप्त की जा सकती है।
लेखिका बताती हैं कि कभी-कभी ईश्वर हमें ऐसे असाधारण (विलक्षण) लोगों से मिला देता है, जिन्हें देखकर हमें अपने जीवन के दुःख बहुत छोटे लगने लगते हैं। लेखिका ने अपने पड़ोस में एक ऐसी ही युवती, डॉ. चन्द्रा को देखा। डॉ. चन्द्रा का निचला धड़ (कमर के नीचे का हिस्सा) पोलियो के कारण पूरी तरह निर्जीव था। इसके बावजूद, वह बिना किसी सहारे के अपनी कार से उतरकर अपनी ह्वीलचेयर (पहिएदार कुर्सी) पर बैठ जाती थीं और बड़ी निपुणता से अपने सारे कार्य स्वयं करती थीं। उनका यह स्वावलंबन देखकर लेखिका आश्चर्यचकित रह जाती थीं।
लेखिका डॉ. चन्द्रा की तुलना लखनऊ के एक मेधावी (बुद्धिमान) युवक से करती हैं। उस युवक का आई.ए.एस. परीक्षा के दौरान एक दुर्घटना में केवल एक हाथ कट गया था। एक हाथ खोने मात्र से उस युवक ने जीवन से हार मान ली, वह मानसिक संतुलन खो बैठा और नशे की गोलियों का सहारा लेकर अस्पताल (नूरमंजिल) पहुँच गया।
दूसरी ओर डॉ. चन्द्रा हैं, जिनका आधा शरीर निष्प्राण है, फिर भी उनके चेहरे पर कोई उदासी नहीं है। उनकी आँखों में जीवन जीने की असीम इच्छा (जिजीविषा) और बड़ी-बड़ी महत्वाकांक्षाएँ हैं। उन्होंने विज्ञान (माइक्रोबायोलॉजी) के क्षेत्र में कई शोध किए और डॉक्टर की उपाधि (Ph.D) प्राप्त की।
डॉ. चन्द्रा केवल विज्ञान में ही नहीं, बल्कि अन्य कलाओं में भी अत्यंत निपुण थीं। उन्होंने जर्मन भाषा सीखी, बहुत सुंदर कविताएँ लिखीं, कढ़ाई-बुनाई में अद्भुत नमूने बनाए और भारतीय व पाश्चात्य संगीत में भी रुचि दिखाई। वह गर्ल गाइड में राष्ट्रपति द्वारा 'स्वर्ण कार्ड' पाने वाली प्रथम दिव्यांग बालिका थीं। उन्होंने अपने कार्य को सुगम बनाने के लिए अपनी कार का विशेष नक्शा स्वयं तैयार किया और अपनी प्रयोगशाला (Laboratory) को अपनी पहुँच के अनुसार व्यवस्थित कर लिया।
डॉ. चन्द्रा की इस महान सफलता के पीछे उनकी माँ श्रीमती टी. सुब्रह्मण्यम् (वीर जननी) का बहुत बड़ा त्याग और तपस्या थी। जब चन्द्रा अठारह महीने की थीं, तब पोलियो से उनका शरीर लकवाग्रस्त हो गया। डॉक्टरों ने कह दिया था कि यह लड़की जीवन भर केवल गर्दन हिला पाएगी, परंतु माँ ने हार नहीं मानी।
माँ ने अपनी बेटी की परछाईं बनकर उसका साथ दिया। वे उसे स्कूल ले जातीं, पूरी कक्षा में उसकी कुर्सी घुमातीं और उच्च शिक्षा में भी उसका पूरा साथ दिया। उनके इसी अनवरत संघर्ष और त्याग के लिए उन्हें 'वीर जननी' के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनकी माँ का यह वाक्य अत्यंत प्रेरणादायक है कि "ईश्वर यदि एक द्वार बंद करता है, तो दूसरा द्वार खोल भी देता है।"
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| अपराजिता | जो कभी हारी न हो (पराजित न हुई हो) |
| विलक्षण | अद्भुत / असाधारण |
| विच्छिन्न | अलग किया हुआ / कटा हुआ |
| अभिशप्त | शाप से ग्रस्त / शापित |
| मेधावी | बुद्धिमान / प्रतिभावान |
| उत्फुल्ल | अत्यंत प्रसन्न / खिला हुआ |
| जिजीविषा | जीने की प्रबल इच्छा |
| यातनाप्रद | कष्ट या पीड़ा देने वाला |
| पक्षाघात | लकवा रोग (Paralysis) |
| आभामंडित | तेज (चमक) से भरा हुआ |
- (क) दूसरों के दुःख अपने दुःखों से बड़े लगने लगते हैं। (सही)
- (ख) हमारे कष्टों से बड़े कष्ट को कोई हँसकर झेलता दिखाई देता है। (सही)
- (ग) अपने कष्टों के लिए विधाता को दोषी मान लेते हैं। (गलत)
- (घ) कष्टों को ईश्वर की इच्छा मानकर स्वीकार कर लेते हैं। (गलत)
- उन्होंने अत्यन्त सुन्दर कविताएँ लिखीं।
- कढ़ाई-बुनाई के सुन्दर नमूने बनाए।
- मैक्समूलर भवन से जर्मन भाषा की विशेष परीक्षा उत्तीर्ण की।
- वे 'गर्ल गाइड' में राष्ट्रपति का स्वर्ण कार्ड पाने वाली प्रथम दिव्यांग बालिका बनीं।
- भारतीय और पाश्चात्य संगीत दोनों में उनकी गहरी रुचि थी।
- (क) वह बित्ते-भर की लड़की मुझे किसी देवांगना से कम नहीं लगी।
भाव: डॉ. चन्द्रा का कद यद्यपि बहुत छोटा था, किन्तु उनका साहस और कष्टों को हँसकर सहने की क्षमता किसी दिव्य देवकन्या (देवी) के समान महान और वन्दनीय थी। - (ख) पूरा निचला धड़ सुन्न है, फिर भी बोटी-बोटी फड़क रही है।
भाव: यद्यपि उनका आधा शरीर पूरी तरह निर्जीव (लकवाग्रस्त) है, फिर भी उनके भीतर जीवन जीने, कुछ नया करने और आगे बढ़ने की असीम ऊर्जा और उत्साह भरा हुआ है। - (ग) मैं चाहती हूँ कि कोई मुझे सामान्य-सा सहारा भी न दे।
भाव: यह वाक्य डॉ. चन्द्रा के 'स्वावलंबन' (आत्मनिर्भरता) को दर्शाता है। वे अपनी शारीरिक अक्षमता के बावजूद किसी पर बोझ नहीं बनना चाहती थीं और अपने सारे कार्य स्वयं करने में विश्वास रखती थीं। - (घ) 'चिकित्सा ने जो खोया है, वह विज्ञान ने पाया'।
भाव: डॉ. चन्द्रा एक सफल शल्य-चिकित्सक (सर्जन) बनना चाहती थीं, लेकिन निचला धड़ निर्जीव होने के कारण उन्हें प्रवेश नहीं मिला। तब उन्होंने 'माइक्रोबायोलॉजी' विज्ञान को चुना और उसमें महान शोध करके यह सिद्ध कर दिया कि चिकित्सा क्षेत्र का नुकसान, विज्ञान क्षेत्र का बहुत बड़ा लाभ बन गया। - (ङ) ईश्वर सब द्वार एक साथ बन्द नहीं करता। यदि एक द्वार बन्द करता है तो दूसरा द्वार खोल भी देता है।
भाव: मनुष्य को संकट के समय कभी निराश नहीं होना चाहिए। यदि ईश्वर एक रास्ता (शारीरिक क्षमता) बंद कर देता है, तो वह निश्चय ही सफलता का कोई दूसरा मार्ग (विलक्षण बुद्धि व प्रतिभा) खोल देता है।
जब किसी शब्द के अंत में 'प्रद' प्रत्यय जुड़ता है, तो वह उस शब्द को विशेषण बना देता है। 'प्रद' का अर्थ होता है "प्रदान करने वाला" (देने वाला)।
| मूल शब्द | प्रत्यय | नया शब्द (विशेषण) | अर्थ |
|---|---|---|---|
| कष्ट | + प्रद | कष्टप्रद | कष्ट (पीड़ा) देने वाला |
| आनन्द | + प्रद | आनन्दप्रद | आनन्द (खुशी) देने वाला |
| लाभ | + प्रद | लाभप्रद | लाभ (फायदा) देने वाला |
| हानि | + प्रद | हानिप्रद | हानि (नुकसान) देने वाला |
| ज्ञान | + प्रद | ज्ञानप्रद | ज्ञान (शिक्षा) देने वाला |
वाक्य में किसी बात पर अतिरिक्त बल या ज़ोर देने के लिए जिन अव्यय शब्दों का प्रयोग होता है, उन्हें 'निपात' कहते हैं। (जैसे- ही, भी, तो, तक, मात्र, भर)।
- वह आज घर जाएगा तो।
- मैंने उसे देखा तो था।
- जब मैं वहाँ पहुँचा, तो (तब) वह जा चुका था।
- जब पानी बरसेगा, तो (तब) फसल अच्छी होगी।
जिस वाक्य में दो या दो से अधिक स्वतंत्र (सरल) वाक्य किसी योजक शब्द (जैसे- और, किन्तु, परन्तु, इसलिए, पर) द्वारा जुड़े होते हैं, उसे संयुक्त वाक्य कहते हैं।
- प्राण तो बच गए, पर बायाँ हाथ चला गया। (यहाँ 'पर' योजक है)
- मैं निरन्तर इसके जीवन की भीख माँगती रही और एक आर्थोपेडिक सर्जन के पास ले गई। (यहाँ 'और' योजक है)
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