UP Board Class 7 Hindi Chapter 5 निजभाषा उन्नति | कक्षा 7 हिंदी पाठ 5 सम्पूर्ण समाधान
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पाठ 5: निजभाषा उन्नति
UP Board Class 7 Hindi Chapter 5 निजभाषा उन्नति एक अत्यंत प्रेरणादायक कविता है, जिसके रचयिता भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हैं। इस पाठ में कवि ने मातृभाषा के महत्व, उसकी उन्नति तथा समाज और देश की प्रगति के लिए आपसी एकता पर विशेष बल दिया है।
इस पोस्ट में Class 7 Hindi Chapter 5 Solution के अंतर्गत सभी पद्यांशों की सरल भावार्थ सहित व्याख्या, शब्दार्थ, विचार और कल्पना, अभ्यास प्रश्नोत्तर, तुकान्त शब्द तथा भाषा की बात (व्याकरण) को परीक्षा की दृष्टि से आसान भाषा में प्रस्तुत किया गया है। यह सामग्री UP Board Class 7 परीक्षा 2026 के लिए अत्यंत उपयोगी है।
- कवि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का परिचय
- निजभाषा उन्नति – सभी पद्यांशों की व्याख्या
- घर की फूट बुरी – भावार्थ सहित
- महत्वपूर्ण शब्दार्थ
- सभी अभ्यास प्रश्नों के उत्तर
- व्याकरण – तत्सम शब्द व तुकान्त शब्द
कवि परिचय : भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
- जन्म: 9 सितम्बर सन् 1850 ई० (वाराणसी)
- विशेषता: आपको आधुनिक हिन्दी गद्य का जनक माना जाता है।
- प्रमुख रचनाएँ: 'प्रेम माधुरी', 'प्रेम फुलवारी', 'भक्तमाल'।
- निधन: 6 जनवरी सन् 1885 ई० (केवल 35 वर्ष की कम आयु में)।
प्रस्तुत कविता हमारी पाठ्यपुस्तक 'मंजरी' के 'निजभाषा उन्नति' नामक पाठ से ली गई है। इसके रचयिता आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रणेता भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी हैं。
प्रसंग (Theme):इस पद्यांश में कवि ने अपनी मातृभाषा (हिंदी) के विकास पर अत्यधिक बल दिया है। साथ ही, देश की तरक्की के लिए 'आपसी फूट' (आपसी कलह) से दूर रहने का कड़ा संदेश भी दिया है।
बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटै न हिय को शूल।।
करहु बिलम्ब न भ्रात अब, उठहु मिटावहु शूल。
निज भाषा उन्नति करहु, प्रथम जो सब को मूल ।।
कवि कहते हैं कि अपनी मातृभाषा का विकास ही संसार में सभी प्रकार की उन्नतियों की जड़ (आधार) है। अपनी मातृभाषा के ज्ञान के बिना मनुष्य के हृदय का दुःख और अज्ञानता समाप्त नहीं हो सकती।
इसलिए हे देशवासियों! अब और अधिक देर मत करो। जागो और अपने मन की पीड़ा को दूर करो। सबसे पहले अपनी भाषा का विकास करो, क्योंकि यही सारे विकास का मुख्य रास्ता है।
राज काज दरबार में, फैलावहु यह रत्न।।
सुत सो तिय सो मीत सो, भृत्यन सो दिन रात。
जो भाषा मधि कीजिए, निज मन की बहु बात।।
कवि देशवासियों से प्रार्थना करते हैं कि पूरी कोशिश करके अपनी मातृभाषा को सारे संसार में फैलाओ। सरकारी कामकाज और राज-दरबार में अपनी भाषा रूपी इस अनमोल रत्न का प्रयोग करो।
अपने पुत्र, अपनी पत्नी, अपने मित्रों और सेवकों के साथ दिन-रात अपनी ही भाषा में बातचीत करनी चाहिए। अपने मन की सारी भावनाएं अपनी मातृभाषा में ही व्यक्त करने से प्रेम और अपनापन बढ़ता है।
सबै बढ़ावहु बेगि मिलि, कहत पुकार-पुकार।।
पढ़ो लिखो कोउ लाख विध, भाषा बहुत प्रकार。
पै जबही कछु सोचिहो, निज भाषा अनुसार।।
कवि जोर देकर कह रहे हैं कि हम सबको मिलकर अपनी भाषा, अपने धर्म, अपने सम्मान और अपने उत्तम व्यवहार को तेजी से आगे बढ़ाना चाहिए।
मनुष्य चाहे दुनिया भर की अनेकों भाषाएं सीख ले और बहुत पढ़ाई कर ले, लेकिन जब भी उसे गहराई से कुछ सोचना होगा, तो उसके विचार हमेशा अपनी मातृभाषा के माध्यम से ही उत्पन्न होंगे।
पै निज भाषा ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।।
कवि स्पष्ट करते हैं कि भले ही इंसान अंग्रेजी भाषा पढ़कर सभी सांसारिक कलाओं में कुशल हो जाए, परन्तु अपनी मातृभाषा के ज्ञान के बिना उसका व्यक्तित्व हमेशा अधूरा (हीन) ही रहता है।
घर के फूटहिं सों बिनसाई सुबरन लंकपुरी।।
फूटहिं सों सत कौरव नासे भारत युद्ध भयो。
जाको घाटो या भारत में अबलौं नहिं पुजयो।।
कवि कहते हैं कि इस संसार में 'घर की आपसी फूट' (मनमुटाव) बहुत बुरी चीज़ है। इसी फूट के कारण रावण की सोने की लंका नष्ट हो गई थी।
इसी पारिवारिक कलह के कारण सौ कौरव मारे गए और महाभारत का महाविनाशकारी युद्ध हुआ। उस युद्ध से भारतवर्ष को जो हानि हुई, उसकी भरपाई आज तक नहीं हो सकी है।
जाको फल अब लौं भोगत सब आरज होइ गुलाम ।।
फूटहि सों नवनन्द विनासो गयो मगध को राज。
चन्द्रगुप्त को नासन चाह्यो आपु नसे सह साज।।
आपसी दुश्मनी और फूट के कारण ही राजा जयचंद ने विदेशी यवनों (आक्रमणकारियों) को भारत पर हमला करने के लिए आमंत्रित किया था। उसी का परिणाम है कि आज तक सभी भारतीय गुलामी की पीड़ा सह रहे हैं।
इसी फूट के कारण मगध के राजा नवनंद का विनाश हुआ। उसने चंद्रगुप्त को नष्ट करना चाहा था, लेकिन अपनी फूट के कारण वह स्वयं अपने पूरे राज्य के साथ तबाह हो गया।
तो अपने घर में भूले हू फूट करौ जनि कोय ।।
कवि अंत में चेतावनी देते हुए कहते हैं कि यदि आप इस दुनिया में अपनी धन-दौलत, अपना सम्मान और अपनी शक्ति को बचाकर रखना चाहते हैं, तो भूलकर भी अपने घर और देश में फूट (बंटवारा) मत होने दीजिए।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| मूल | आधार / जड़ |
| शूल | पीड़ा / दुःख |
| जत्न | प्रयास / यत्न |
| भृत्यन | सेवकों / नौकरों को |
| मधि | बीच में |
| बेगि | जल्दी / शीघ्र |
| प्रवीन | कुशल / होशियार |
| हीन | अधूरा / तुच्छ |
| बिनसाई | नष्ट हो गई |
| जवन | यवन (विदेशी आक्रमणकारी) |
| आरज | आर्य (भारतवासी) |
यदि मुझे अपनी बात कहने का मौका मिले, तो मैं अपनी मातृभाषा 'हिन्दी' को ही चुनूँगा। क्योंकि इंसान अपनी मातृभाषा में अपने विचारों और भावनाओं को जितनी गहराई और सरलता से व्यक्त कर सकता है, उतना किसी और भाषा में नहीं कर सकता।
निज भाषा की उन्नति से बहुत से लाभ होंगे:
- मातृभाषा का विकास ही देश के सम्पूर्ण विकास का आधार है।
- इससे लोगों के हृदय का अज्ञान और दुःख दूर होता है।
- समाज में एकता, सम्मान और भाईचारे की भावना मजबूत होती है।
कवि के अनुसार हमें अपनी मातृभाषा का प्रसार राज-काज (सरकारी कामकाज), न्यायालयों, पूरे संसार में और अपने परिवार तथा मित्रों के बीच हर जगह करना चाहिए।
कवि ने अपनी भाषा के अतिरिक्त अपने धर्म, अपने सम्मान, अपने श्रेष्ठ कर्मों और अपने अच्छे व्यवहार को आगे बढ़ाने की बात कही है।
कवि ने महाभारत के विनाशकारी युद्ध का मुख्य कारण कौरवों और पांडवों के बीच की 'आपसी फूट' (पारिवारिक कलह) को बताया है।
आशय: मातृभाषा का विकास ही सभी प्रकार की तरक्की (व्यक्तिगत, सामाजिक और राष्ट्रीय) की नींव है। बिना इसके देश उन्नति नहीं कर सकता।
(ख) जो जग में धन मान और बल अपुनी राखन होय। तो अपने घर में भूले हू फूट करौ जनि कोय।।आशय: यदि कोई व्यक्ति इस संसार में अपनी दौलत, सम्मान और ताकत को सुरक्षित रखना चाहता है, तो उसे भूलकर भी अपने परिवार या देश में आपसी फूट नहीं पड़ने देनी चाहिए।
संस्कृत के वे शब्द जो हिंदी भाषा में बिना किसी बदलाव के ज्यों-के-त्यों प्रयोग किए जाते हैं, उन्हें तत्सम शब्द कहते हैं।
| तद्भव (कविता के शब्द) | तत्सम (शुद्ध रूप) |
|---|---|
| करम | कर्म |
| जदपि | यद्यपि |
| सुबरन | सुवर्ण (स्वर्ण) |
| हिय | हृदय |
| जल | जल |
| मीत | मित्र |
| धरम | धर्म |
जिन शब्दों के अंतिम अक्षर और उनकी मात्राएं समान होती हैं, जिससे कविता में एक लय (Rhyme) बनती है, उन्हें तुकान्त शब्द कहते हैं।
- मूल — शूल
- जत्न — रत्न
- रात — बात
- व्यवहार — पुकार
- प्रकार — अनुसार
- प्रवीन — हीन
🌟 राष्ट्रभाषा हिन्दी पर महापुरुषों के विचार
- महात्मा गांधी: "राष्ट्र भाषा की जगह एक हिन्दी ही ले सकती है, कोई दूसरी भाषा नहीं।"
- सुमित्रानंदन पंत: "हिन्दी का भविष्य उज्ज्वल है वह विश्व की सांस्कृतिक भाषा होगी।"
- विनोबा भावे: "भारत की एकता के लिए आवश्यक है कि देश की सभी भाषाएँ नागरी लिपि अपनाएँ।"
- सुभाषचन्द्र बोस: "प्रान्तीय ईष्या-द्वेष दूर करने में जितनी सहायता हिन्दी-प्रचार से मिलेगी उतनी दूसरी चीज से नहीं।"
- डॉ० जाकिर हुसैन: "हिन्दी की प्रगति से देश की सभी भाषाओं की प्रगति होगी।"
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