UP Board Class 7 Hindi Chapter 3 वीरों का कैसा हो वसंत | कक्षा 7 हिंदी सम्पूर्ण समाधान
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पाठ 3: वीरों का कैसा हो वसंत
UP Board Class 7 Hindi Chapter 3 वीरों का कैसा हो वसंत एक ओजपूर्ण और राष्ट्रप्रेरक कविता है, जिसकी रचना सुप्रसिद्ध कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान जी ने की है। इस पाठ में कवयित्री ने वसंत ऋतु के सौंदर्य और युद्धभूमि की कठोरता की तुलना करते हुए यह बताया है कि सच्चे वीरों के लिए वसंत का अर्थ केवल प्रकृति का उल्लास नहीं, बल्कि देश की रक्षा के लिए त्याग, बलिदान और पराक्रम है।
इस पोस्ट में UP Board Class 7 Hindi Chapter 3 Solution के अंतर्गत सभी पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या, सरल भावार्थ, शब्दार्थ, अभ्यास प्रश्न-उत्तर, तथा व्याकरण से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों को सरल और परीक्षा-उपयोगी भाषा में प्रस्तुत किया गया है। यह सामग्री Class 7 Hindi परीक्षा 2026 की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी है।
- सभी पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या
- सरल भाषा में भावार्थ
- शब्दार्थ (Word Meaning)
- अभ्यास प्रश्न-उत्तर
- व्याकरण (समास, मुहावरे, पर्यायवाची)
- परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न
कवयित्री परिचय : सुभद्रा कुमारी चौहान
- जन्म: 16 अगस्त, 1904 ई० (निहालपुर, इलाहाबाद)
- विशेषता: स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने वाली प्रथम महिला सत्याग्रही।
- प्रमुख रचनाएँ: 'मुकुल', 'बिखरे मोती', 'उन्मादिनी', 'त्रिधारा'।
- सम्मान: 'सेक्सरिया पुरस्कार'।
- निधन: 15 फरवरी, 1948 ई०
प्रस्तुत कविता हमारी पाठ्यपुस्तक 'मंजरी' के 'वीरों का कैसा हो वसंत' नामक पाठ से ली गई है। इसकी रचयिता सुप्रसिद्ध राष्ट्रप्रेमी कवयित्री श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान जी हैं。
प्रसंग (Theme):इस कविता में कवयित्री ने प्रकृति के सौंदर्य और युद्ध भूमि की कठोरता की तुलना करते हुए वीरों के पराक्रम और उनके वास्तविक वसंत (बलिदान) का अत्यंत ओजपूर्ण वर्णन किया है।
आ रही हिमाचल से पुकार,
है उदधि गरजता बार-बार,
प्राची, पश्चिम, भू, नभ अपार
सब पूछ रहे दिग् दिगन्त,
वीरों का कैसा हो वसंत ?
कवयित्री कहती हैं कि आज हिमालय पर्वत पुकार-पुकार कर पूछ रहा है, विशाल समुद्र (उदधि) बार-बार गरज कर पूछ रहा है। इतना ही नहीं, पूरब (प्राची), पश्चिम, यह धरती और यह अपार आकाश— दिशाओं का कोना-कोना (दिग् दिगन्त) आज यही प्रश्न कर रहा है कि आखिर शूरवीरों का वसंत कैसा होना चाहिए?
मधु लेकर आ पहुँचा अनंग,
वसु-वसुधा पुलकित अंग-अंग,
हैं वीर वेश में किन्तु कंत,
वीरों का कैसा हो वसंत ?
भर रही कोकिला इधर तान,
मारू बाजे पर उधर-गान,
है रंग और रण का विधान,
मिलने आये हैं आदि-अन्त,
वीरों का कैसा हो वसंत ?
वसंत ऋतु के आते ही खेतों में सरसों फूल गई है, जिससे चारों ओर पीला रंग छा गया है। कामदेव (अनंग) भी फूलों का रस (मधु) लेकर आ गए हैं। पूरी पृथ्वी (वसुधा) खुशी से रोमांचित (पुलकित) है। लेकिन जो शूरवीर पति (कंत) है, वह इस सौंदर्य को छोड़कर युद्ध की वेशभूषा में तैयार खड़ा है।
एक तरफ तो कोयल (कोकिला) अपने मधुर गीत गा रही है, और दूसरी तरफ रणभूमि में युद्ध के नगाड़े (मारू बाजे) बज रहे हैं। ऐसा लग रहा है मानो वसंत का रंग और युद्ध (रण) का नियम एक साथ आ गए हों। यहाँ जीवन (आदि) और मृत्यु (अंत) का अनोखा संगम हो रहा है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि वीरों का वसंत कैसा हो?
चल चितवन हो या धनुष-बाण,
हो रस-विलास या दलित-त्राण,
अब यही समस्या है दुरन्त,
वीरों का कैसा हो वसंत ?
वीरों के सामने यह सबसे बड़ी और गंभीर समस्या (दुरन्त) है कि वे वसंत में अपनों के गले लगें (गलबाँहे) या फिर युद्ध के लिए हाथों में तलवार (कृपाण) उठाएँ? वे प्रेम भरी तिरछी नज़रों (चितवन) में खो जाएँ या फिर देश की रक्षा के लिए धनुष-बाण तानें? वे वसंत के रसों का आनंद लें या फिर अत्याचार सह रहे गरीबों और शोषितों की रक्षा (दलित-त्राण) करें?
लंके, तुझमें क्यों लगी आग,
ऐ कुरूक्षेत्र ! अब जाग, जाग
बतला अपने अनुभव अनन्त,
वीरों का कैसा हो वसंत ?
हल्दी-घाटी का शिला-खंड,
ऐ दुर्ग! सिंह-गढ़ के प्रचण्ड,
राणा नाना का कर घमण्ड
दो जगा आज स्मृतियाँ ज्वलंत,
वीरों का कैसा हो वसंत ?
कवयित्री बीते हुए इतिहास (अतीत) का आह्वान करते हुए कहती हैं कि हे अतीत! अब अपनी चुप्पी तोड़ो। हे लंका! तुम बताओ कि तुममें आग क्यों लगी थी? हे कुरुक्षेत्र! तुम जागकर अपने महाभारत के अनन्त अनुभवों को सुनाओ कि न्याय के लिए युद्ध क्यों जरूरी है।
हे हल्दीघाटी के पत्थरों! हे तानाजी के सिंहगढ़ किले! तुम महाराणा प्रताप और नाना साहब की उन गौरवशाली और ज्वलंत (आग जैसी तेज) यादों को आज फिर से जगा दो, ताकि आज की युवा पीढ़ी जान सके कि सच्चे वीरों का वसंत युद्ध भूमि में ही खिलता है।
बिजली भर दे वह छन्द नहीं,
है कलम बँधी स्वच्छन्द नहीं,
फिर हमें बतावे कौन? हन्त !
वीरों का कैसा हो वसंत ?
कवयित्री बड़े ही दुख (हन्त!) के साथ कहती हैं कि आज हमारे बीच 'भूषण' और 'चंदबरदाई' जैसे वीर रस के महान कवि नहीं हैं, जिनकी कविताएँ सुनकर युवाओं की नसों में बिजली दौड़ जाती थी। दुर्भाग्य से, आज हमारी लेखनी भी गुलाम (अंग्रेज़ों के अधीन) है, हम आज़ाद (स्वच्छंद) होकर नहीं लिख सकते। ऐसे में आज देश के युवाओं को कौन बताएगा कि सच्चे वीरों का वसंत कैसा होना चाहिए?
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| उदधि | समुद्र |
| प्राची | पूर्व दिशा |
| दिगन्त | दिशा का छोर |
| अनंग | कामदेव |
| वसुधा | पृथ्वी |
| पुलकित | रोमांचित / खुश |
| कन्त | पति / प्रिय |
| मारू | युद्ध के समय बजने वाला बाजा |
| कृपाण | तलवार |
| दलित-त्राण | शोषितों की रक्षा करना |
| ज्वलंत | प्रकाशवान / तेज |
| प्रचण्ड | बहुत अधिक तीव्र |
| दुरन्त | अति गम्भीर / कठिन |
| हन्त | खेद या शोक सूचक शब्द |
दुर्गम बर्फ से घिरी पहाड़ियों पर सैनिकों को निम्न कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है:
- वहाँ कड़कड़ाती ठंड और बर्फीले तूफानों का सामना करना पड़ता है।
- ऊंचाई के कारण ऑक्सीजन (Oxygen) की कमी हो जाती है, जिससे सांस लेने में परेशानी होती है।
- महीनों तक परिवार से दूर रहना पड़ता है।
- हर समय दुश्मनों और आतंकवादियों के हमले का खतरा बना रहता है।
मैं 'वायु सेना' (Air Force) में भाग लेना चाहूँगा। क्योंकि मुझे आसमान में ऊँची उड़ान भरना पसंद है। एक फाइटर पायलट बनकर मैं आसमान से ही दुश्मनों को नष्ट करके अपने देश की हवाई सीमाओं की रक्षा करना चाहता हूँ।
इस कविता में हिमालय, गरजता हुआ समुद्र, पूर्व-पश्चिम दिशाएँ, पृथ्वी, आकाश और दिशाओं का कोना-कोना (दिगंत) यह पूछ रहे हैं कि वीरों का वसंत कैसा होना चाहिए।
वीरों के लिए वसंत का रंग केवल फूलों का रंग नहीं, बल्कि बलिदान का 'केसरिया' रंग है। उनके लिए प्रकृति का आनंद लेना वसंत नहीं है, बल्कि देश की रक्षा के लिए रणभूमि में लड़ना ही उनका सच्चा वसंत है।
आशय: दिशाओं का हर कोना और प्रकृति का हर कण यही जानना चाहता है कि शूरवीरों के लिए वसंत ऋतु मनाने का तरीका क्या होना चाहिए।
(ख) है रंग और रण का विधान, मिलने आये हैं आदि-अन्त,आशय: युद्ध भूमि में एक तरफ जीवन का उत्सव (रंग) है और दूसरी तरफ युद्ध (रण) का कठोर नियम। यहाँ जीवन (आदि) और मृत्यु (अंत) दोनों एक साथ गले मिलने आ गए हैं।
(ग) बिजली भर दे वह छन्द नहीं, है कलम बंधी स्वच्छन्द नहीं,आशय: आज देश में ऐसे कवि नहीं हैं जिनकी कविताएँ सुनकर युवाओं की नसों में बिजली (जोश) दौड़ जाए। और हमारी कलम भी आज़ाद (स्वच्छंद) नहीं है, क्योंकि हम अंग्रेज़ों के गुलाम हैं।
कवयित्री अतीत (इतिहास) से मौन त्यागने के लिए इसलिए कह रही हैं, ताकि लंका दहन और कुरुक्षेत्र के युद्ध जैसी घटनाओं के माध्यम से आज के युवाओं को यह बताया जा सके कि अन्याय के खिलाफ लड़ना ही वीरों का सच्चा कर्तव्य है।
| शब्द | पर्यायवाची (Synonyms) |
|---|---|
| भू | पृथ्वी, धरती, वसुंधरा, धरा |
| नभ | आकाश, गगन, अम्बर, आसमान |
| पुष्प | फूल, सुमन, कुसुम, प्रसून |
| मधु | शहद, मकरंद, वसंत |
| बिजली | चपला, तड़ित, दामिनी, विद्युत् |
दो या दो से अधिक शब्दों के मेल (संक्षेपीकरण) से एक नया सार्थक शब्द बनाने की प्रक्रिया को समास कहते हैं। समास विधि से बने शब्द को समस्त पद कहते हैं।
निम्नलिखित समस्त पदों का विग्रह करें-
| समस्त पद | समास विग्रह (Explanation) | समास का नाम |
|---|---|---|
| शिलाखण्ड | शिला का खण्ड (टुकड़ा) | तत्पुरुष समास |
| सिंहगढ़ | सिंह का गढ़ (किला) | तत्पुरुष समास |
| हिमाचल | हिम (बर्फ) का अचल (पर्वत) | तत्पुरुष समास |
| गलबाँहें | गले में डाली हुई बाँहें | तत्पुरुष समास |
| धनुषबाण | धनुष और बाण | द्वंद्व समास |
ऐसे वाक्यांश जो अपने सामान्य अर्थ को छोड़कर किसी 'विशेष अर्थ' को प्रकट करते हैं, मुहावरे कहलाते हैं।
- दाँत खट्टे करना: (बुरी तरह हरा देना)
प्रयोग: भारतीय सेना ने युद्ध में दुश्मनों के दाँत खट्टे कर दिए। - ईंट से ईंट बजाना: (पूरी तरह नष्ट कर देना / कड़ा मुकाबला करना)
प्रयोग: महाराणा प्रताप ने मुगलों की ईंट से ईंट बजा दी थी। - छक्के छुड़ाना: (परेशान कर देना / बुरी तरह हराना)
प्रयोग: रानी लक्ष्मीबाई ने युद्ध के मैदान में अंग्रेज़ों के छक्के छुड़ा दिए। - अंगारों पर चलना: (खतरनाक या कठिन काम करना)
प्रयोग: देश की रक्षा के लिए हमारे सैनिक हर दिन अंगारों पर चलते हैं। - खेत रह जाना: (युद्ध में वीरगति प्राप्त करना / शहीद होना)
प्रयोग: मातृभूमि की रक्षा करते-करते अनेक वीर जवान सीमा पर खेत रह गए।
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