UP Board Class 6 Hindi Chapter 5 Solution – मेरी माँ | Basic Shiksha Solution
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✔️ पाठ का विस्तृत एवं सरल सारांश
✔️ कठिन शब्दों के आसान अर्थ
✔️ सभी प्रश्न-उत्तर (Exam Oriented)
✔️ व्याकरण – उपसर्ग, प्रत्यय, संधि, कारक
✔️ UP Board के अनुसार सम्पूर्ण समाधान
पाठ 5: मेरी माँ
लेखक परिचय : रामप्रसाद 'बिस्मिल'
- 🔴 जन्म: 4 जून, 1897 ई० (मैनपुरी, उत्तर प्रदेश)
- 🔴 बलिदान: 19 दिसम्बर, 1927 ई० (गोरखपुर जेल में फाँसी)
- 🔴 पहचान: भारत के अमर क्रांतिकारी, कवि, लेखक और कुशल अनुवादक।
- 🔴 प्रमुख रचनाएँ: 'निज जीवन की छटा' (आत्मकथा), 'मन की लहर', 'केथोराइन' (जीवनी)।
प्रस्तावना: प्रस्तुत पाठ 'मेरी माँ' महान क्रांतिकारी रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा का एक अत्यंत भावुक अंश है। इसमें उन्होंने अपनी सफलता और देश-प्रेम के पीछे अपनी माँ के अपार योगदान, त्याग और प्रेरणा का वर्णन किया है।
1. माँ का विवाह और शिक्षाबिस्मिल जी की माँ का विवाह केवल 11 वर्ष की आयु में हुआ था। शुरुआत में वे गृहकार्य में निपुण नहीं थीं, लेकिन दादी जी की बहन के सहयोग से उन्होंने सब सीख लिया। बिस्मिल के जन्म के कुछ वर्षों बाद उन्होंने स्वयं पढ़ने का प्रयास किया। घर का काम निपटाकर वे मोहल्ले की शिक्षित सहेलियों से अक्षर ज्ञान लेती थीं और अपने कठिन परिश्रम से जल्द ही देवनागरी पुस्तकें पढ़ने लगीं।
2. माँ का प्रभाव और सहयोगबिस्मिल के चरित्र-निर्माण में उनकी माँ का सबसे बड़ा हाथ था। जब बिस्मिल ने आर्यसमाज में प्रवेश किया (जिसका पिताजी विरोध करते थे), तब माँ ने ही उनका पूरा समर्थन किया। माँ ने उन्हें देश-सेवा के लिए उसी प्रकार प्रेरित किया जैसे मेजिनी (इटली के महान क्रांतिकारी) को उनकी माँ ने किया था।
3. माँ का आदेश और बिस्मिल की प्रतिज्ञामाँ का सबसे बड़ा और कठोर आदेश यह था कि "किसी की प्राणहानि न हो"। उनका मानना था कि शत्रु को भी कभी प्राणदंड मत देना। बिस्मिल जी ने माँ के इस आदेश का पालन करने के लिए क्रांतिकारी गतिविधियों में कई बार अपनी प्रतिज्ञा तक भंग कर दी, ताकि किसी की जान न जाए।
4. अंतिम इच्छा और विदाईफाँसी की सजा मिलने के बाद बिस्मिल जी को इस बात का गहरा दुःख था कि वे अपनी माँ की सेवा करके उनके ऋण (कर्ज) से मुक्त नहीं हो सके। उनकी एकमात्र इच्छा (तृष्णा) थी कि वे एक बार श्रद्धापूर्वक माँ के चरणों की सेवा कर सकें। अंत में, वे अपनी माँ से यही वरदान मांगते हैं कि मृत्यु के समय उनका मन डगमगाए नहीं और वे भारत माता के लिए हंसते-हंसते अपना बलिदान दे दें।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| नितान्त | एकदम / बिल्कुल |
| अवलोकन | देखना / भली-भांति निरीक्षण करना |
| जन्मदात्री | जन्म देने वाली माता |
| परिशोध | ऋण (कर्ज) का पूर्ण भुगतान करना |
| अवर्णनीय | जिसका शब्दों में वर्णन न किया जा सके |
| संलग्न | लगा हुआ / पूरी तरह जुटा हुआ |
| तृष्णा | प्रबल इच्छा / चाह / लोभ |
| ताड़ना | सुधारने के उद्देश्य से डाँटना या मारना |
| सान्त्वना | तसल्ली देना / ढाढस बंधाना |
- 🔸 वे बच्चों को अच्छी शिक्षा, संस्कार और सही मार्गदर्शन दे सकती हैं।
- 🔸 परिवार के स्वास्थ्य, स्वच्छता और पौष्टिक खान-पान का वैज्ञानिक तरीके से ध्यान रख सकती हैं।
- 🔸 घर के आर्थिक प्रबंधन (बजट) को समझदारी से संभाल कर बचत कर सकती हैं।
- 🔸 वे अंधविश्वासों और रूढ़ियों से दूर रहकर समाज में एक सकारात्मक बदलाव ला सकती हैं।
(अ) बिस्मिल की माँ का विवाह-
- ✔️ 1. ग्यारह वर्ष की अवस्था में हुआ था। (सही)
- ❌ 2. अठारह वर्ष की अवस्था में हुआ था।
- ❌ 3. बीस वर्ष की अवस्था में हुआ था।
(ब) बिस्मिल के क्रान्तिकारी जीवन में उनकी माँ ने उनकी वैसी ही सहायता की, जैसे-
- ❌ 1. भगत सिंह की उनकी माँ ने की थी।
- ❌ 2. चन्द्रशेखर आजाद की उनकी माँ ने की थी।
- ✔️ 3. मेजिनी की उनकी माँ ने की थी। (सही)
(स) बिस्मिल ने माता को धैर्य धारण करने के लिए कहा, क्योंकि उनका पुत्र-
- ❌ 1. कायर का जीवन नहीं जीना चाहता था।
- ❌ 2. छिपकर नहीं रहना चाहता था।
- ✔️ 3. भारतमाता की सेवा में प्राणों की बलि चढ़ाना चाहता था। (सही)
परिभाषा: वे शब्दांश जो किसी मूल शब्द के आरंभ (शुरुआत) में जुड़कर उसके अर्थ में परिवर्तन ला देते हैं या एक नया अर्थ बना देते हैं, 'उपसर्ग' कहलाते हैं।
| उपसर्ग | बने हुए नए शब्द |
|---|---|
| प्र (आगे/अधिक) | प्रगति, प्रकोप, प्रबल, प्रयोग |
| परि (चारों ओर) | परिवार, परिवर्तन, परिणाम, परिपूर्ण |
| अव (बुरा/नीचे) | अवगुण, अवनति, अवतार, अवशेष |
| निर् (बिना/रहित) | निर्बल (बिना बल के), निर्धन, निर्जन, निर्मल |
परिभाषा: वे शब्दांश जो किसी मूल शब्द के अंत (आखिर) में जुड़कर उसके अर्थ और रूप को बदल देते हैं, 'प्रत्यय' कहलाते हैं।
| प्रत्यय | बने हुए नए शब्द (मूल शब्द + प्रत्यय) |
|---|---|
| ईय (योग्य) | पठनीय (पठन+ईय), करणीय (कर्म+ईय), रमणीय, शोभनीय |
| इक (सम्बन्धित) | सामाजिक (समाज+इक), आर्थिक (अर्थ+इक), दैनिक (दिन+इक), साप्ताहिक |
नियम: दो शब्दों के मिलने से जो विकार (परिवर्तन) होता है, उसे 'सन्धि' कहते हैं। उन शब्दों को वापस अलग-अलग करना 'सन्धि-विच्छेद' कहलाता है।
- 🔸 परमात्मा = परम + आत्मा (दीर्घ सन्धि: अ + आ = आ)
- 🔸 प्रत्येक = प्रति + एक (यण सन्धि: इ + ए = ये)
- 🔸 भोजनादि = भोजन + आदि (दीर्घ सन्धि: अ + आ = आ)
- 🔸 सदैव = सदा + एव (वृद्धि सन्धि: आ + ए = ऐ)
संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से वाक्य के अन्य शब्दों (विशेषकर क्रिया) के साथ उसका संबंध प्रकट होता है, उसे कारक कहते हैं। जैसे- ने, को, से, के लिए, में, पर आदि।
- ✔️ शाहजहाँपुर आने के थोड़े दिनों के बाद दादी जी ने अपनी छोटी बहन को बुला लिया।
- ✔️ तुम्हारी दया की छाया में मैंने अपने जीवनभर कोई कष्ट न अनुभव किया।
- ✔️ तुम्हारी दया से ही मैं देश-सेवा में संलग्न हो सका।
- ✔️ आप के आदेश की पूर्ति करने के लिए मुझे अपनी प्रतिज्ञा भंग करनी पड़ी।
जो विशेषण शब्द संज्ञा या सर्वनाम की संख्या बताते हैं, उन्हें संख्यावाचक विशेषण कहते हैं। इसके दो भेद होते हैं:
- 1. निश्चित संख्यावाचक: जहाँ संख्या पक्की हो (जैसे- दो, दस, पहला)।
- 2. अनिश्चित संख्यावाचक: जहाँ संख्या का पक्का पता न हो (जैसे- कुछ, कई, सब)।
| (क) सभी सदस्य खा रहे हैं। | अनिश्चित संख्यावाचक (कितने सदस्य, पता नहीं) |
| (ख) कुछ लोग टहल रहे हैं। | अनिश्चित संख्यावाचक (कितने लोग, पता नहीं) |
| (ग) मुझे दो दर्जन केले दे दो। | निश्चित संख्यावाचक (24 केले, संख्या पक्की है) |
| (घ) मैंने पचास रुपये का आम खरीदा। | निश्चित संख्यावाचक (50 रुपये, संख्या पक्की है) |
अमर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल की प्रसिद्ध पंक्तियाँ
"सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है ज़ोर कितना बाजु-ए-कातिल में है।"
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