UP Board Class 6 Hindi Chapter 4 Solution – नीति के दोहे (कबीर और रहीम) | Basic Shiksha Solution
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- ✔️ कबीर और रहीम के सभी दोहों का सरल अर्थ व व्याख्या
- ✔️ कठिन शब्दों के अर्थ
- ✔️ अभ्यास प्रश्न-उत्तर (Exam Oriented)
- ✔️ अनुप्रास व श्लेष अलंकार की विस्तृत व्याख्या (उदाहरण सहित)
- ✔️ UP Board के अनुसार सम्पूर्ण समाधान
पाठ 4: नीति के दोहे (कबीर और रहीम)
कवि परिचय
1. कबीरदास
|
2. रहीम
|
मुई खाल की स्वाँस सो, सार भसम है-जाय।।
दुर्बल = कमजोर, जाकी = जिसकी, हाय = आह/बद्दुआ, मुई = मरी हुई, सार = लोहा, भसम = राख।
सरल अर्थ:कबीरदास जी कहते हैं कि हमें किसी कमजोर (दुर्बल) व्यक्ति को नहीं सताना चाहिए। क्योंकि कमजोर व्यक्ति की हाय (बद्दुआ) बहुत प्रभावशाली होती है। जिस प्रकार मरे हुए जानवर की खाल से बनी धौंकनी (लुहार की भट्ठी) की हवा से लोहा भी जलकर राख हो जाता है, उसी प्रकार दुखी आत्मा की आह से अत्याचारी का नाश हो जाता है।
व्याख्या (Explanation) :प्रस्तुत दोहे में कबीरदास जी ने निर्बल और असहाय लोगों के प्रति दया और सहानुभूति रखने की शिक्षा दी है। उनका मानना है कि किसी भी कमजोर व्यक्ति को अपने बल का अहंकार दिखाकर परेशान नहीं करना चाहिए। जब एक सताए हुए दुखी हृदय से 'आह' या बद्दुआ निकलती है, तो उसमें बहुत शक्ति होती है। उदाहरण देते हुए कबीर कहते हैं कि जैसे लुहार की भट्ठी में मरी हुई जानवर की खाल (धौंकनी) से निकलने वाली हवा कठोर लोहे को भी गलाकर भस्म (राख) कर देती है, उसी प्रकार एक निर्बल व्यक्ति के हृदय से निकली पीड़ा और हाय किसी भी शक्तिशाली अत्याचारी के सर्वनाश का कारण बन सकती है। इसलिए हमें सदैव दूसरों के प्रति संवेदनशील रहना चाहिए।
स्रवन द्वार संचरे, सालै सकल सरीर।।
औषधी = दवा, कटुक = कड़वा, स्रवन द्वार = कान के रास्ते, संचरे = प्रवेश करता है, सालै = चुभता है/कष्ट देता है।
सरल अर्थ:कबीर जी कहते हैं कि मीठी बोली दवा (औषधि) के समान है जो सुनने वाले को शीतलता और सुख देती है। जबकि कड़वी बोली तीर के समान होती है, जो कानों के रास्ते शरीर में प्रवेश करती है और पूरे शरीर (हृदय) को कष्ट देती है।
व्याख्या (Explanation):इस दोहे में कबीरदास जी ने वाणी के महत्त्व को बहुत ही सुंदर ढंग से समझाया है। मीठे और प्रेमपूर्ण शब्द किसी भी दुखी या परेशान व्यक्ति के लिए दवा का कार्य करते हैं, जिससे मन को शांति और शीतलता मिलती है। इसके विपरीत, कठोर और कड़वे शब्द किसी नुकीले तीर की तरह होते हैं। जब ये कड़वे शब्द हमारे कानों (स्रवन द्वार) से होकर हृदय तक पहुँचते हैं, तो वे केवल मन को ही नहीं बल्कि पूरे शरीर को गहरा कष्ट और पीड़ा देते हैं। इसलिए हमें हमेशा सोच-समझकर और दूसरों के प्रति मधुर और सम्मानजनक भाषा का ही प्रयोग करना चाहिए।
जो दिल खोजा आपनो, मुझ-सा बुरा न कोय।।
मैं सारे संसार में बुरे व्यक्ति को ढूँढने निकला, परन्तु मुझे कोई बुरा आदमी नहीं मिला। लेकिन जब मैंने अपने स्वयं के मन (दिल) को टटोला, तो मुझे पता चला कि मुझसे बुरा कोई और नहीं है। (अर्थात हमें दूसरों की बुराई देखने के बजाय अपनी कमियों को सुधारना चाहिए)।
व्याख्या (Explanation):कबीरदास जी ने इस दोहे के माध्यम से मनुष्य की उस प्रवृत्ति पर प्रहार किया है जिसमें वह हमेशा दूसरों की कमियाँ और बुराइयाँ खोजता रहता है। वे कहते हैं कि जब व्यक्ति दूसरों में दोष निकालने के बजाय आत्मनिरीक्षण (खुद की कमियों को देखना) करता है, तब उसे अपनी असलियत का ज्ञान होता है। संसार में कोई भी व्यक्ति पूरी तरह से बुरा नहीं होता। असली बुराई हमारे अपने मन, अहंकार और दृष्टिकोण में छिपी होती है। जो मनुष्य अपनी बुराइयों को पहचान कर उन्हें दूर करने का प्रयास करता है, वही सच्चा ज्ञानी है। अतः दूसरों को दोष देने से पहले हमें अपने गिरेबान में झाँकना चाहिए।
सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय ।।
सज्जन (साधु) पुरुष का स्वभाव सूप (अनाज साफ करने वाला) जैसा होना चाहिए। सूप जिस प्रकार अच्छे अनाज (सार) को अपने पास रख लेता है और कचरे/भूसे (थोथा) को उड़ा देता है, उसी प्रकार सज्जन व्यक्ति को अच्छी बातों को ग्रहण करना चाहिए और व्यर्थ की बातों को छोड़ देना चाहिए।
व्याख्या (Explanation):कबीरदास जी ने एक सच्चे सज्जन (साधु) की पहचान बताते हुए उसकी तुलना अनाज फटकने वाले 'सूप' से की है। सूप का यह विशेष गुण होता है कि वह काम के अनाज (सार) को बचा लेता है और कूड़े-कचरे (थोथा) को उड़ा देता है। इसी प्रकार, एक विवेकशील और अच्छे व्यक्ति को समाज में व्याप्त बुराइयों, व्यर्थ की बातों और निंदा को अनदेखा कर देना चाहिए। उसे केवल ज्ञान, सद्गुणों और अच्छी बातों को ही अपने जीवन में ग्रहण करना चाहिए। हमें भी सूप की तरह अपने विचारों को शुद्ध रखना चाहिए और नकारात्मकता को अपने मन से निकाल देना चाहिए।
माली सींचे सौ घड़ा ऋतु आए फल होय ।।
हे मन! धीरज रख, सब काम धीरे-धीरे (समय पर) ही होते हैं। जैसे माली चाहे पेड़ में सौ घड़े पानी सींच दे, लेकिन फल तभी आएगा जब उसका सही मौसम (ऋतु) आएगा। (जल्दबाजी से कोई काम नहीं होता)।
व्याख्या (Explanation):इस दोहे में कबीरदास जी ने धैर्य (Patience) का महत्त्व समझाया है। वे कहते हैं कि मनुष्य को किसी भी कार्य में व्यर्थ की जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। प्रकृति का अपना एक नियम और समय-चक्र होता है। कोई भी सफलता या परिणाम रातों-रात नहीं मिलता। जिस प्रकार एक माली पौधे को जल्दी बड़ा करने की चाह में यदि सौ घड़े पानी भी डाल दे, तब भी उस पर फल अपनी निश्चित ऋतु आने पर ही लगेंगे। उसी प्रकार, निरंतर प्रयास करते रहना हमारा कर्म है, लेकिन उसका फल हमें उचित समय आने पर ही प्राप्त होगा। अतः जीवन में संयम और धैर्य बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है।
बाटनवारे को लगे, ज्यों मेहँदी को रंग।।
रहीम दास जी कहते हैं कि वे लोग धन्य हैं जिनका शरीर परोपकार (दूसरों की भलाई) के लिए है। जिस प्रकार मेहंदी पीसने वाले (बाटनवारे) के हाथों में मेहंदी का रंग अपने आप लग जाता है, उसी प्रकार दूसरों का भला करने वाले का भला स्वयं ही हो जाता है।
व्याख्या (Explanation):रहीम जी ने इस दोहे में परोपकार (निःस्वार्थ सेवा) की महिमा का वर्णन किया है। जो व्यक्ति अपना जीवन दूसरों के दुखों को दूर करने और उनकी सहायता करने में व्यतीत करता है, उसका जीवन सार्थक और महान है। ऐसे लोगों को अलग से अपने लिए कुछ माँगने की आवश्यकता नहीं होती। प्रकृति का नियम है कि भलाई के बदले भलाई ही मिलती है। उदाहरण के लिए, जो व्यक्ति दूसरों के लिए मेहंदी पीसता है, उसके हाथ बिना मेहंदी लगाए ही लाल और सुंदर हो जाते हैं। ठीक वैसे ही, जो दूसरों के जीवन में खुशियाँ भरता है, उसके अपने जीवन में ईश्वर की कृपा से स्वतः ही सुख, शांति और यश की प्राप्ति हो जाती है।
पानी गये न ऊबरै, मोती मानुस चून।।
इस दोहे में 'पानी' शब्द का प्रयोग तीन अलग-अलग संदर्भों में (श्लेष अलंकार के रूप में) किया गया है। रहीम जी कहते हैं कि मनुष्य को समाज में अपनी मर्यादा और सम्मान हमेशा बनाए रखना चाहिए:
- 🔴 मोती के लिए: यहाँ पानी का अर्थ 'चमक' से है। चमक खो देने पर मोती बेकार हो जाता है।
- 🔴 मनुष्य के लिए: यहाँ पानी का अर्थ 'सम्मान या इज्जत' से है। समाज में इज्जत चले जाने पर मनुष्य का जीवन मृत समान हो जाता है।
- 🔴 चूने के लिए: यहाँ पानी का अर्थ 'जल' से है। बिना जल के चूना सूख कर पत्थर हो जाता है और किसी काम का नहीं रहता।
सुनी अठिलैहं लोग सब, बाँटि न लैहें कोय ।।
अपने मन के दुख (बिथा) को मन के भीतर ही छिपाकर रखना चाहिए। दूसरे लोग दुख सुनकर उसका मज़ाक तो उड़ा सकते हैं (इठलाते हैं), लेकिन कोई उसे बाँटता (कम करता) नहीं है。
व्याख्या (Explanation):प्रस्तुत दोहे में रहीम जी ने व्यावहारिक जीवन की एक बड़ी सच्चाई को उजागर किया है। वे कहते हैं कि हमें अपनी व्यक्तिगत परेशानियाँ, कष्ट और दुख हर किसी के सामने प्रकट नहीं करने चाहिए। समाज में ऐसे लोगों की कमी है जो सच्ची सहानुभूति रखते हों। ज्यादातर लोग आपके दुख को सुनकर आपके मुँह पर तो सांत्वना देंगे, लेकिन पीठ पीछे आपकी मजबूरी का उपहास (मजाक) ही उड़ाएँगे। संसार में कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे का दुख अपने ऊपर नहीं ले सकता। इसलिए अपनी पीड़ा को स्वयं सहन करने की शक्ति विकसित करनी चाहिए और उसे केवल सच्चे हितैषियों या ईश्वर से ही साझा करना चाहिए।
गिरधर मुरलीधर कहे, कछु दुःख मानत नाहिं ।।
रहीम कहते हैं कि बड़े व्यक्ति को छोटा (लघु) कह देने से उनका बड़प्पन घट नहीं जाता। जैसे भगवान कृष्ण को 'गिरधर' (पर्वत उठाने वाला) या 'मुरलीधर' (ग्वाला/मुरली बजाने वाला) कहने से उनकी महिमा कम नहीं होती, और न ही वे इसका बुरा मानते हैं।
व्याख्या (Explanation):इस दोहे में सच्ची महानता का लक्षण बताया गया है। रहीम जी का मानना है कि जो व्यक्ति वास्तव में गुणवान, ज्ञानी और महान है, उसे यदि कोई अज्ञानी व्यक्ति छोटा या साधारण कह दे, तो इससे उस महान व्यक्ति के मूल्य में कोई कमी नहीं आती। उसका महत्व जस का तस रहता है। उदाहरण के लिए, भगवान श्रीकृष्ण साक्षात् ईश्वर हैं, लेकिन जब लोग उन्हें प्रेम या अज्ञानवश 'ग्वाला', 'मुरलीधर' (बांसुरी बजाने वाला) या 'गिरधर' कहकर पुकारते हैं, तो प्रभु इसका तनिक भी बुरा नहीं मानते। सच्चा बड़प्पन व्यक्ति के गुणों में होता है, दूसरों के द्वारा दी गई उपाधियों या तानों में नहीं।
चतुरन चित रहिमन लगी, समय चूक की हूक ।।
समय पर काम बनने जैसा कोई लाभ नहीं है और समय चूक जाने जैसी कोई हानि नहीं है। समझदार (चतुर) लोगों के मन में अवसर चूक जाने की कसक (हूक) हमेशा बनी रहती है।
व्याख्या (Explanation):रहीम जी ने इस दोहे में 'समय के सदुपयोग' (Time Management) का अमूल्य संदेश दिया है। बीता हुआ समय कभी लौटकर नहीं आता। जो व्यक्ति सही अवसर पर सही निर्णय लेकर अपना कार्य कर लेता है, उससे बड़ा भाग्यशाली और लाभ में रहने वाला कोई नहीं है। इसके विपरीत, जो आलस्य या अज्ञानता के कारण सही समय गँवा देता है, उसे भविष्य में केवल पछतावा ही हाथ लगता है। एक बुद्धिमान व्यक्ति इस बात को भली-भाँति समझता है कि एक बार हाथ से निकला हुआ अवसर दोबारा नहीं मिलेगा, इसीलिए समय चूक जाने की टीस (चुभन) उसके हृदय में हमेशा बनी रहती है। अतः हमें हर पल का सही उपयोग करना चाहिए।
| (क) मधुर वाणी औषधि का काम करती है... | मधुर बचन है औषधी, कटुक बचन है तीर। |
| (ख) कोई भी कार्य समय पर ही होता है। | धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय। |
| (ग) अपने दुख को कहीं उजागर नही करना चाहिए। | रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय। |
| (घ) परोपकार करने वाले लोग प्रशंसनीय होते हैं। | वे रहीम नर धन्य हैं, पर उपकारी अंग। |
| (ङ) दूसरे लोगों में बुराई देखना ठीक नहीं। | बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय। |
- 🔴 दूसरे लोग दुख सुनकर उसे बाँटते नहीं हैं।
- 🔴 वे पीठ पीछे उस दुख का मजाक (इठलाते) उड़ाते हैं।
काव्य में जहाँ एक ही व्यंजन वर्ण (अक्षर) की आवृत्ति (Repetition) बार-बार होती है, जिससे भाषा में सुंदरता और लय उत्पन्न होती है, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।
- 🔸 "सालै सकल सरीर"
व्याख्या: इस पंक्ति में 'स' वर्ण (अक्षर) की आवृत्ति तीन बार हुई है। एक ही अक्षर बार-बार आने के कारण यहाँ अनुप्रास अलंकार है। - 🔸 "सूप सुभाय"
व्याख्या: यहाँ भी 'स' वर्ण की आवृत्ति लगातार दो बार हुई है, जिससे वाक्य में संगीतात्मकता आ गई है। - 🔸 "चतुरन चित"
व्याख्या: इस उदाहरण में 'च' वर्ण की आवृत्ति हुई है, अतः यहाँ भी अनुप्रास अलंकार है।
'श्लेष' का शाब्दिक अर्थ होता है - 'चिपका हुआ'। काव्य में जहाँ कोई शब्द एक ही बार प्रयोग हो, लेकिन प्रसंग के अनुसार उसके एक से अधिक अर्थ निकलें (अर्थात एक ही शब्द में कई अर्थ चिपके हों), वहाँ श्लेष अलंकार होता है।
"रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।
पानी गये न ऊबरै, मोती मानुस चून।।"
व्याख्या: इस दोहे की दूसरी पंक्ति में आए 'पानी' शब्द का प्रयोग एक बार हुआ है, परन्तु इसके तीन अलग-अलग अर्थ हैं:
1. मोती के सन्दर्भ में 'पानी' का अर्थ है = चमक
2. मनुष्य (मानुस) के सन्दर्भ में 'पानी' का अर्थ है = सम्मान या इज्जत
3. चूने के सन्दर्भ में 'पानी' का अर्थ है = जल
"मंगल को देखि पट देत बार-बार है।"
व्याख्या: यहाँ 'पट' शब्द के दो अर्थ निकलते हैं:
1. पहला अर्थ है 'वस्त्र' (कपड़ा) - (याचक को देखकर बार-बार वस्त्र दान देना)।
2. दूसरा अर्थ है 'दरवाजा' - (याचक को देखकर बार-बार दरवाजा बंद कर लेना)।
| तद्भव | तत्सम | तद्भव | तत्सम |
|---|---|---|---|
| भसम | भस्म | औषधी | औषधि |
| सत | सत्य | सरीर | शरीर |
| मानुस | मनुष्य | सबद | शब्द |
| किरपा | कृपा | हरख | हर्ष |
- 🔴 पट: वस्त्र, दरवाजा
- 🔴 दर: भाव (कीमत), दरवाजा
- 🔴 कर: हाथ, टैक्स
- 🔴 जड़: मूल (पेड़ की जड़), मूर्ख
- 🔴 गोली: दवाई की गोली, बंदूक की गोली
- 🔴 सारंग: मोर, सांप, दीपक (इसके अनेक अर्थ हैं)
🌟 हिंदी के नवरत्न (Navratna of Hindi)
हिंदी साहित्य में इन 9 कवियों को नवरत्न माना जाता है:
1. कबीर, 2. तुलसी, 3. सूरदास, 4. देव, 5. भूषण, 6. मतिराम, 7. बिहारी, 8. चन्दबरदाई, 9. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र।
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