चतुर्थः पाठः - उद्बोधनम्
|| अच्छी सीख (Good Counsel) ||
नमस्ते प्रिय विद्यार्थियों! 🙏
इस पाठ में छोटे-छोटे संस्कृत गीतों के माध्यम से जीवन में अच्छी आदतों को अपनाने और बुरी आदतों को छोड़ने की प्रेरणा दी गई है।
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मा कुरु दर्पम्, मा कुरु गर्वम्
मा भव मानी, मानय सर्वम्।
मा भज दैन्यम्, मा भज शोकम्
मुदितमना भव, मोदय लोकम्।। 1 ।।
🚫 😤 😊 🌍
हिंदी अनुवाद:
इस श्लोक में कवि ने जीवन के मूलभूत सिद्धांतों की शिक्षा दी है। घमंड मत करो, अभिमान मत करो। अभिमानी (घमंडी) मत बनो, (बल्कि) सबका सम्मान करो। साथ ही हीनभावना और दुख में न डूबकर सदैव प्रसन्न रहना चाहिए । प्रसन्न मन वाले बनो और संसार (लोगों) को प्रसन्न करो।
भावार्थ:
हे मनुष्य! जीवन में कभी भी अपने रूप, धन, ज्ञान अथवा सफलता पर अहंकार मत करो। अभिमान व्यक्ति को अपनों से ही दूर कर देता है। स्वयं को श्रेष्ठ मानने की बजाय दूसरों को सम्मान देना चाहिए ,अपने भीतर के दर्प (घमंड) को त्यागकर सभी का आदर करना सीखो, क्योंकि वास्तविक रूप से महान वही है जो सबको सम्मान देता है। जीवन में कितनी भी विपत्तियाँ क्यों न आएँ, कभी भी परिस्थितियों के सम्मुख नतमस्तक न हो (दीनता मत अपनाओ) और बीती हुई बातों का शोक मत करो। सदैव अपने मन को अन्दर से प्रसन्न और सकारात्मक रखो। जब तुम स्वयं आनंदित रहोगे, तभी इस संपूर्ण संसार में हर्ष और प्रसन्नता का संचार कर पाओगे। इस श्लोक में विनम्रता, प्रसन्नता और दूसरों के सम्मान की शिक्षा दी गई है।विद्यार्थी को सिखाया गया है कि घमण्ड और शोक से दूर रहकर, प्रसन्नचित्त होकर समाज में आनंद फैलाना चाहिए |
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मा वद मिथ्या, मा वद व्यर्थम्
न चल कुमार्गे, न कुरु अनर्थम्।
पाहि विपन्नम्, पालय दीनम्
लालय जननी-जनक-विहीनम्।। 2 ।।
🗣️ ❌ 🛤️ 🤲
हिंदी अनुवाद:
यह श्लोक सत्यवादिता और परोपकार की शिक्षा देता है। झूठ मत बोलो, बेकार (व्यर्थ) मत बोलो। बुरे रास्ते (कुमार्ग) पर मत चलो, अनर्थ (बुरा काम) मत करो। दुखी (मुसीबत में पड़े) लोगों की रक्षा करो, गरीबों का पालन करो। माता-पिता से रहित (अनाथ) बच्चों का लालन-पालन करो (प्यार करो)।
भावार्थ:
हमारी वाणी हमारी सबसे बड़ी शक्ति है, इसलिए इसका उपयोग कभी असत्य बोलने अथवा व्यर्थ की बातें करने में नष्ट मत करो। जीवन की यात्रा में कभी भी अनुचित मार्ग (कुमार्ग) का चयन मत करना और कोई ऐसा कृत्य मत करना जिससे किसी का अहित हो। वास्तविक मानवता इसी में है कि जब कोई व्यक्ति संकट या विपत्ति में हो, तो तुम उसके रक्षक बनो। जो लोग असहाय और निर्धन हैं, उनका संबल बनो। और इस संसार में जो बालक अनाथ हैं (जो माता-पिता के वात्सल्य से वंचित हैं), उन्हें गले लगाओ, उन्हें भरपूर वात्सल्य और स्नेह दो। तुम्हारा एक छोटा सा आश्रय किसी रोते हुए बालक का जीवन प्रकाशमान कर सकता है। यह श्लोक सत्य, सेवा और संवेदनशीलता की ओर प्रेरित करता है |
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तनयं पाठय तनयां पाठय
शिक्षय नीतिं दोषं वारय।
कुरु उपकारम्, कृत्यमुदारम्
अपनय दूरे चित्तविकारम्।। 3 ।।
👦 👧 📚 ✨
हिंदी अनुवाद:
पुत्र और पुत्री दोनों को समान रूप से शिक्षा देना चाहिए। (उन्हें) शिक्षा के साथ नीति का समावेश आवश्यक है, और दोषों को दूर करना शिक्षक का कर्तव्य है।
उपकार करना और उदार कार्य करना श्रेष्ठ जीवन का मार्ग है । मन के विकारों , दोषों (बुराइयों)को दूर करना आत्मिक उन्नति की ओर पहला कदम है।
भावार्थ:
शिक्षा ही समाज का सबसे बड़ा प्रकाश है और इस पर सबका समान अधिकार है। इसलिए पुत्र को भी पढ़ाओ और पुत्री को भी पढ़ाओ—दोनों को बिना किसी भेदभाव के आगे बढ़ने का समान अवसर प्रदान करो। उन्हें केवल पुस्तकीय ज्ञान ही नहीं, अपितु उत्तम संस्कार, नैतिकता और उचित-अनुचित का बोध कराओ, ताकि उनके भीतर के दोष समाप्त हो सकें। जीवन में सदैव दूसरों पर परोपकार और उदारतापूर्ण कार्य करो। अपने चित्त (मन) में उत्पन्न होने वाले अनुचित विचारों, ईर्ष्या, क्रोध और स्वार्थ जैसे विकारों को सर्वदा के लिए दूर कर दो। एक निर्मल और पवित्र मन ही वास्तविक शांति प्राप्त कर सकता है। यह श्लोक विद्यार्थियों को समानता, नीति और मानसिक शुद्धता की शिक्षा देता है।
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मा पिब किञ्चिद वस्तु निषिद्धम्
मा भज दुव्यसनं प्रतिषिद्धम्।
मा नय पलमपि व्यर्थ समयम्
कुरु जगदीश्वर-चिन्तनमभयम्।। 4 ।।
🍺 ❌ ⏳ 🙏
हिंदी अनुवाद:
कोई भी निषिद्ध (मना की गई/हानिकारक) वस्तु मत पीओ (नशा मत करो)। बुरी आदतों (दुर्व्यसनों) को मत अपनाओ। एक पल (क्षण) भी समय बेकार मत बिताओ। निडर होकर ईश्वर का चिंतन (भजन) करो।
भावार्थ:
हमारा शरीर ईश्वर द्वारा प्रदत्त एक सुंदर मंदिर है, इसलिए इसे कभी भी मादक पदार्थों अथवा हानिकारक वस्तुओं (निषिद्ध वस्तु) से मलिन मत करो। उन दुर्व्यसनों (बुरी आदतों) से सदैव दूर रहो जो तुम्हारा और तुम्हारे परिवार का पतन कर सकते हैं। समय इस जीवन की सबसे अमूल्य धरोहर है; जो समय व्यतीत हो गया, वह पुनः लौट कर नहीं आता। इसलिए जीवन का एक क्षण भी व्यर्थ के कार्यों में नष्ट मत करो। इन सबसे ऊपर, सबसे बड़ा आश्रय उस जगदीश्वर (परमात्मा) का है। बिना किसी भय या उद्वेग के, सच्चे मन से उस ईश्वर का चिंतन (ध्यान) करो और अपने जीवन को सार्थक एवं पूर्ण बनाओ।
यह श्लोक बच्चों को नैतिक और सात्विक जीवन जीने की प्रेरणा देता है। यह श्लोक बच्चों को अनुशासन, समय का महत्व, और नैतिकता का पाठ पढ़ाता है, जो उनके जीवन को सही दिशा प्रदान करता है।
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1. एकपदेन उत्तरत (एक शब्द में उत्तर दें)
| प्रश्न (Question) |
उत्तर (Answer) |
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(क) कं पालय ?
(किसका पालन करो?)
|
दीनम्
(गरीब का)
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(ख) किं शिक्षय ?
(क्या सिखाओ?)
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नीतिं
(नीति/अच्छी बातें)
|
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(ग) किं अपनय ?
(क्या दूर करो?)
|
चित्तविकारम्
(मन के दोष)
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(घ) किं मा पिब ?
(क्या मत पीओ?)
|
निषिद्धं वस्तु
(हानिकारक वस्तु)
|
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2. त्याज्यकार्याणां करणीयकार्याणां च सूचीं लिखत (त्यागने योग्य और करने योग्य कार्यों की सूची बनाएं)
| त्याज्यकार्याणि (छोड़ने योग्य) ❌ |
करणीयकार्याणि (करने योग्य) ✅ |
| दर्पम् (घमंड) | सर्वम् मानय (सबका सम्मान) |
| गर्वम् (अभिमान) | मुदितमना भव (प्रसन्न रहना) |
| शोकम् (दुःख) | लोकं मोदय (लोगों को खुश करना) |
| मिथ्यावादनम् (झूठ बोलना) | विपन्नं पाहि (दुखियों की रक्षा) |
| व्यर्थवादनम् (बेकार बोलना) | दीनं पालय (गरीबों का पालन) |
| कुमार्गः (बुरा रास्ता) | तनय-तनया पाठनम् (बच्चों को पढ़ाना) |
| अनर्थम् (बुरा काम) | उपकारम् (भलाई) |
| दुर्व्यसनम् (बुरी लत) | ईश्वर-चिन्तनम् (प्रभु का ध्यान) |
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3. चित्रानुसारं वाक्यानि रचयत (चित्र के अनुसार वाक्य बनायें)
नोट: विद्यार्थी अपनी पुस्तक में दिए गए चित्रों को देखकर निम्न प्रकार के वाक्य बना सकते हैं:
- बालकः पठति। (बालक पढ़ रहा है।)
- माता भोजनं पचति। (माता भोजन पका रही है।)
- सा नमस्कारं करोति। (वह नमस्कार कर रही है।)
- बालकाः क्रीडन्ति। (बच्चे खेल रहे हैं।)
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4. पाठात् क्रियापदानि चित्वा लिखत (पाठ से क्रियापद चुनकर लिखें)
कुरु, भव, मानय, भज, वद, चल, पाहि, पालय, लालय, पाठय, शिक्षय, वारय, अपनय, पिब, नय।
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5. कवितां पूरयत (कविता पूरी करें)
(क) मा भज दैन्यम् मा भज शोकम्, मुदितमना भव, मोदय लोकम्।। |
(ख) मा वद मिथ्या, मा वद व्यर्थम्। न चल कुमार्गे, न कुरु अनर्थम्। |
(ग) तनयं पाठय तनयां पाठय। कुरु उपकारम्, कृत्यमुदारम्। |
(घ) मा पिब किञ्चिद वस्तु निषिद्धम् मा भज दुव्यसनं प्रतिषिद्धम्। |
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6. विभक्तिं वचनं च लिखत (विभक्ति और वचन लिखें)
| शब्द |
विभक्ति |
वचन |
| लोकम् |
द्वितीया |
एकवचनम् |
| मार्गे (कुमार्गे) |
सप्तमी |
एकवचनम् |
| तनयाम् |
द्वितीया |
एकवचनम् |
| जगदीश्वरः |
प्रथमा |
एकवचनम् |
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ध्यातव्यम् (ध्यान दें):
आज्ञा देने (Order) या निवेदन (Request) करने के लिए संस्कृत में
'लोट् लकार' (Imperative Mood) का प्रयोग होता है।
उदाहरण:
- कुरु = करो
- मा वद = मत बोलो
- गच्छतु = जाओ
- पठन्तु = पढ़ें
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