UP BOARD CLASS 8 SANSKRIT LESSON 7 - सुभाषितानि | कक्षा 8 संस्कृत पाठ 7 – सुभाषितानि | हिन्दी अनुवाद, भावार्थ, प्रश्न-उत्तर (UP Board)
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यह पोस्ट कक्षा 8 संस्कृत – पाठ 7 “सुभाषितानि” का संपूर्ण, सरल और परीक्षा उपयोगी समाधान प्रस्तुत करती है। यह सामग्री UP Board / SCERT पाठ्यक्रम के अनुसार विशेष रूप से विद्यार्थियों और शिक्षकों को ध्यान में रखकर तैयार की गई है।
इस अध्याय में संकलित सुभाषित संस्कृत साहित्य के अमूल्य रत्न हैं, जो जीवन को सही दिशा देने वाले नैतिक मूल्यों का बोध कराते हैं। पोस्ट में प्रत्येक श्लोक का शुद्ध पाठ, सरल हिन्दी अनुवाद, विस्तृत भावार्थ तथा जीवन से जुड़ा व्यावहारिक संदेश आसान भाषा में समझाया गया है।
इसके साथ ही एकपदेन उत्तर, प्रश्नोत्तर, रिक्त स्थान, विलोम शब्द, अनुवाद तथा व्याकरण (अव्यय पद) को सारणीबद्ध और रंगीन प्रारूप में प्रस्तुत किया गया है, जिससे छात्रों को याद करने और समझने में सुविधा हो। यह पोस्ट परीक्षा तैयारी, पुनरावृत्ति, कक्षा शिक्षण और गृहकार्य — सभी के लिए अत्यंत उपयोगी है।
Class 8 Sanskrit Chapter 7 Subhashitani Hindi Translation and Solutionsसप्तमः पाठः - सुभाषितानि
'सुभाषितानि' का अर्थ है - सुंदर वचन। प्रत्येक सुभाषित एक पूर्ण दर्शन है जो व्यावहारिक जीवन में मार्गदर्शन करता है। यह पाठ छात्रों को संस्कृत की गहराई से परिचित कराते हुए उनके चरित्र निर्माण में सहायक है। इन सुभाषितों के माध्यम से छात्र जीवन के विभिन्न पहलुओं को समझ सकेंगे और अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकेंगे | मुख्य विषय: नैतिक मूल्य, आत्मनियंत्रण, विद्या की महत्ता, और उदारता। केंद्रीय संदेश: सच्चा सुख आत्मनियंत्रण, विद्या, और उदार चरित्र से प्राप्त होता है, न कि लोभ या अहंकार से।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।।1।।
🏠 🌍 ❤️
एतद् विद्यात् समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः।।2।।
😔 ⛓️ 🆚 😊 🕊️
वृथा दानं समर्थस्य वृथा दीनो दिवापि च।।3।।
🌧️ 🌊 🍲 🚫 ☀️ 🪔
व्यसनेन तु मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा।।4।।
📚 ⏳ 🆚 😴 ⚔️
यत्रास्ति सूचिकाकार्यं कृपाणः किं करिष्यति।।5।।
🗡️ 🆚 🪡
विद्यावान् पूज्यते लोके नाविद्यः परिपूज्यते।।6।।
🎓 🙏 🌍
वकारैः पञ्चाभिर्युक्तो नरो भवति पूजितः।।7।।
👕 💪 🗣️ 📖 🙇
| प्रश्न (Question) | उत्तर (Answer) |
|---|---|
|
(क) उदारचरितानां कृते सम्पूर्णा वसुधा किम् अस्ति ?
(उदार चरित्र वालों के लिए पूरी पृथ्वी क्या है?)
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कुटुम्बकम्
(परिवार)
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(ख) अयं निजः परो वेति कः गणयति ?
(यह अपना है या पराया, ऐसा कौन गिनता है?)
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लघुचेतसाम्
(छोटे मन वाले)
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(ग) समुद्रेषु वृष्टिः कीदृशी भवति ?
(समुद्र में वर्षा कैसी होती है?)
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वृथा
(व्यर्थ/बेकार)
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(घ) विद्वान् कुत्र पूज्यते ?
(विद्वान कहाँ पूजा जाता है?)
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लोके
(संसार में)
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(क) सुखदुःखयो किं लक्षणम् अस्ति ?
(सुख और दुःख का क्या लक्षण है?)
उत्तर: सर्वं परवशं दुःखं, सर्वमात्मवशं सुखम् अस्ति।
(सब कुछ पराधीन होना दुःख है और सब कुछ स्वाधीन होना सुख है।)
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(ख) पञ्चवकाराः के सन्ति ?
(पाँच 'व' कौन से हैं?)
उत्तर: पञ्चवकाराः सन्ति - वेशः, वपुः, वाचा, विद्या, विनयः च।
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(ग) धीमतां कालः कथं गच्छति ?
(बुद्धिमानों का समय कैसे बीतता है?)
उत्तर: धीमतां कालः काव्यशास्त्रविनोदेन गच्छति।
(बुद्धिमानों का समय काव्य और शास्त्र के विनोद में बीतता है।)
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(घ) दीनः (दीपः) वृथा कदा भवति ?
(दीपक कब व्यर्थ होता है?)
उत्तर: दीनः (दीपः) दिवा वृथा भवति।
(दिन में दीपक व्यर्थ होता है।)
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| वाक्य (Sentence) |
|---|
| (क) वृथा वृष्टिः समुद्रेषु। |
| (ख) महान्तं प्राप्य सद्बुद्धे (संत्यजेन्न लघुजनम्)। |
| (ग) मूर्खाणां समयः व्यसनेन निद्रया कलहेन (वा गच्छति)। |
| (घ) वेशेन वपुषा वाचा विद्यया विनयेन च। |
| शब्द | विलोम |
|---|---|
| निजः | परः |
| सबलः | निर्बलः |
| दुःखम् | सुखम् |
| उदारः | अनुदारः |
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(क) सर्वं परवशं दुःखम् सर्वमात्मवशं सुखम्।
अनुवाद: पराधीनता में सब दुःख है और स्वाधीनता में सब सुख है।
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(ख) वृथा तृप्तस्य भोजनम्।
अनुवाद: पेट भरे हुए व्यक्ति के लिए भोजन व्यर्थ है।
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(ग) महान्तं प्राप्य सद्बुद्धे।
अनुवाद: हे सद्बुद्धि! बड़े को पाकर (छोटे को मत छोड़ो)।
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(घ) विद्यावान् पूज्यते लोके नाविद्यः परिपूज्यते।
अनुवाद: संसार में विद्यावान पूजा जाता है, विद्याहीन नहीं।
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अव्यय पद: इस पाठ में वा, च, अपि, इति, तु, एव, वृथा, सर्वत्र, वै, खलु आदि शब्द आए हैं।
ये अव्यय कहलाते हैं। इनका रूप तीनों लिंगों, तीनों वचनों और सभी विभक्तियों में एक समान रहता है, कभी बदलता नहीं है।
शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्
अर्थ: निश्चय ही शरीर धर्म का पालन करने का पहला साधन है।
भाव यह है कि कोई भी अच्छा काम या कर्तव्य पूरा करने के लिए शरीर का स्वस्थ होना सबसे जरूरी है। अतः स्वास्थ्य की रक्षा सबसे पहले करनी चाहिए।