U[ BOARD CLASS 8 SANSKRIT Lesson 6 - षष्ठः पाठः - किं तर्तुं जानाति भवान् | कक्षा 8 संस्कृत पाठ 6 – किं तर्तुं जानाति भवान् | हिन्दी अनुवाद, प्रश्न-उत्तर (UP Board)
- Get link
- X
- Other Apps
यह पोस्ट कक्षा 8 संस्कृत – पाठ 6 “किं तर्तुं जानाति भवान्” का संपूर्ण, सरल एवं परीक्षा उपयोगी समाधान प्रस्तुत करती है। यह सामग्री UP Board / SCERT के नवीनतम पाठ्यक्रम के अनुसार तैयार की गई है, जिससे छात्र बिना किसी कठिनाई के पाठ को समझ सकें।
इस पाठ में प्राध्यापक और नाविक के संवाद के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि केवल पुस्तकीय ज्ञान ही पर्याप्त नहीं, बल्कि व्यावहारिक ज्ञान का जीवन में अत्यंत महत्व होता है। कथा रोचक है और नैतिक शिक्षा से भरपूर है।
इस पोस्ट में पाठ का शुद्ध संस्कृत पाठ, सरल हिन्दी अनुवाद, एकपदेन उत्तर, कथन-कर्ता, शब्द निर्माण, द्विभाषी अनुवाद, स्मरणीय वाक्य तथा शिक्षण-संकेत तालिकाओं एवं आकर्षक प्रारूप में दिए गए हैं। यह सामग्री परीक्षा तैयारी, पुनरावृत्ति, होमवर्क और शिक्षकों के अध्यापन के लिए अत्यंत उपयोगी है।
षष्ठः पाठः - किं तर्तुं जानाति भवान्
इस पाठ में एक 'प्राध्यापक' (Professor) और 'नाविक' (Boatman) के बीच की रोचक बातचीत है। इस कथा के माध्यम से ज्ञान के अहंकार और व्यावहारिक बुद्धि के महत्व को दर्शाया गया है। अध्यापक अपने सैद्धांतिक ज्ञान पर गर्व करता है, परंतु जब संकट की घड़ी आती है तो नाविक का व्यावहारिक ज्ञान ही काम आता है। यह पाठ हमें सिखाता है कि सच्चा ज्ञान वही है जो व्यावहारिक जीवन में उपयोगी हो। केवल पुस्तकीय ज्ञान से काम नहीं चलता, जीवन में व्यावहारिक कुशलता भी आवश्यक है।
प्राध्यापकः - भो नाविक! किं भवता कदापि गणितं पठितम्?
नाविकः - न पठितम्।
प्राध्यापक: हे नाविक! क्या तुमने कभी गणित पढ़ा है?
नाविक: नहीं पढ़ा।
नाविकः - ईदृशं मे भाग्यं कुतः? यदहं भौतिकशास्त्रं रसायनशास्त्रं वा पठेयम्।
प्राध्यापकः - नूनं त्वया अर्धांशः जीवनस्य व्यर्थतां नीतः। वद वद त्वया आंग्लभाषा तु पठिता स्यादेव?
नाविकः - (ग्लानिम् अनुभवन्) महाशय! नाहं मात्रा पित्रा वा विद्यालयं प्रेषितः। कुतः पठेयम्?
नाविक: मेरा ऐसा भाग्य कहाँ? कि मैं भौतिकशास्त्र या रसायनशास्त्र पढ़ूँ।
प्राध्यापक: निश्चय ही तुमने जीवन का आधा भाग (1/2) व्यर्थ कर दिया। बोलो-बोलो, तुमने अंग्रेजी भाषा तो पढ़ी ही होगी?
नाविक: (ग्लानि का अनुभव करते हुए) महाशय! न मुझे माता ने और न पिता ने विद्यालय भेजा। कहाँ से पढ़ता?
नाविकः अवोचत् - यदि तर्तुं न जानाति, तदा भवतः सर्वं जीवनं वृथा जातम्। अहं तु बाहुभ्यां नदं तीत्र्वा पारं प्रयामि। किन्तु यदि भवान् अन्यथा न मन्यते, अहं भवन्तं स्वपृष्ठमारोप्य पारगन्तुमिच्छामि।
नाविक: बोला - यदि तैरना नहीं जानते, तो आपका सारा जीवन (100%) व्यर्थ हो गया। मैं तो भुजाओं से नदी तैरकर पार जाता हूँ। किन्तु यदि आप बुरा न मानें, तो मैं आपको अपनी पीठ पर बैठाकर पार ले जाना चाहता हूँ।
| प्रश्न (Question) | उत्तर (Answer) |
|---|---|
|
(क) कः विहर्तुं नावम् आरूढः?
(घूमने के लिए नाव पर कौन चढ़ा?)
|
प्राध्यापकः
|
|
(ख) नौकायाः अग्रेसारणं केन माध्यमेन भवति?
(नौका का आगे बढ़ना किसके माध्यम से होता है?)
|
अरित्रमाध्यमेन
(पतवार से)
|
|
(ग) कः ग्लानिम् अन्वभवत्?
(ग्लानि का अनुभव किसने किया?)
|
नाविकः
|
|
(घ) जलेन पूरिता का जाता?
(जल से कौन भर गई?)
|
नौका
|
| कथन (Statement) | वक्ता (Speaker) |
|---|---|
|
(क) भवता कदापि गणितं पठितम्? (क्या आपने कभी गणित पढ़ा है?) |
प्राध्यापकः |
|
(ख) ईदृशं मे भाग्यं कुतः? (मेरा ऐसा भाग्य कहाँ?) |
नाविकः |
|
(ग) त्वया अर्धांशः जीवनस्य व्यर्थतां नीतः। (तुमने जीवन का आधा भाग व्यर्थ कर दिया।) |
प्राध्यापकः |
|
(घ) अहं तर्तुं न जानामि। (मैं तैरना नहीं जानता।) |
प्राध्यापकः |
|
(ङ) यदि तर्तुं न जानाति, तदा भवतः सर्वं जीवनं वृथा जातम्। (यदि तैरना नहीं जानते, तो आपका सारा जीवन व्यर्थ है।) |
नाविकः |
| धातु + प्रत्यय | पद (Word) | अर्थ (Meaning) |
|---|---|---|
| चल् + तुमुन् | चलितुम् | चलने के लिए |
| हस् + तुमुन् | हसितुम् | हँसने के लिए |
| क्रीड् + तुमुन् | क्रीडितुम् | खेलने के लिए |
| पठ् + तुमुन् | पठितुम् | पढ़ने के लिए |
| नी + त्वा | नीत्वा | ले जाकर |
| गम् + त्वा | गत्वा | जाकर |
| लिख् + त्वा | लिखित्वा | लिखकर |
|
(क) किं त्वया संस्कृत-भाषा पठिता?
अनुवाद: क्या तुमने संस्कृत भाषा पढ़ी है?
|
|
(ख) जीवनस्य त्रयो भागाः अपार्थाः।
अनुवाद: जीवन के तीन भाग व्यर्थ हो गए।
|
|
(ग) प्राध्यापकः नावम् आरूढः।
अनुवाद: प्राध्यापक नाव पर चढ़ा।
|
|
(घ) भवान् खलु जलमध्ये विहरतु।
अनुवाद: आप निश्चय ही जल के बीच में विहार (घूमें) करें।
|
|
(क) वह पढ़ने के लिए आता है।
अनुवाद: सः पठितुम् आगच्छति।
|
|
(ख) क्या तुम सब तैरना जानते हो?
अनुवाद: किं यूयं तर्तुं जानीथ?
|
|
(ग) क्या तुम प्रतिदिन खेलते हो?
अनुवाद: किं त्वं प्रतिदिनं क्रीडसि?
|
|
(घ) हम दोनों घूमने के लिए नदी के किनारे जाते हैं।
अनुवाद: आवां भ्रमितुं (विहर्तुं) नदीतटं गच्छावः।
|
1. पाठस्य कथानकं छात्रैः लघुसमूहेषु समयं निश्चितं कृत्वा लेखयत।
(पाठ की कहानी को छात्रों द्वारा छोटे समूहों में समय निश्चित करके लिखवाएं।)
2. कर्मवाच्ये कर्मणः लिङ्गानुसारं कृदन्त-क्रियापदानां लिङ्गस्य परिवर्तनं बोधयत।
(कर्मवाच्य में कर्म के लिंग के अनुसार कृदन्त क्रियापदों के लिंग परिवर्तन का ज्ञान कराएं।)
सहसा विदधीत न क्रियाम् !
अर्थ: अचानक (बिना सोचे-समझे) कोई कार्य नहीं करना चाहिए।
भाव यह है कि किसी भी काम को करने से पहले अच्छी तरह सोच-विचार कर लेना चाहिए, जल्दबाजी में किया गया कार्य नुकसानदेह हो सकता है।
📘 कक्षा 8 संस्कृत – अन्य महत्वपूर्ण पाठ
- Get link
- X
- Other Apps
Comments
Post a Comment