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Class 6 Science Chapter 7 जीवों में अनुकूलन – सभी प्रश्न उत्तर | UP Board Solution

UP Board Class 6 Science | पाठ 7 — जीवों में अनुकूलन Solution | Basic Shiksha Solution

UP Board Class 6 Science Chapter 7 जीवों में अनुकूलन Solution

BASIC SHIKSHA SOLUTION ● UPBOARD CLASS 6 SCIENCE SOLUTION
📖 पाठ का संक्षिप्त परिचय:

UP Board Class 6 Science Chapter 7 जीवों में अनुकूलन एक अत्यंत रोचक अध्याय है जिसमें सजीवों के वास स्थान तथा उनके शरीर में उस वातावरण के अनुसार होने वाले विशेष परिवर्तनों का विस्तार से वर्णन किया गया है। इस पोस्ट में UP Board Class 6 Science Chapter 7 Solution के अंतर्गत बहुविकल्पीय प्रश्न, रिक्त स्थान, सही-गलत, मिलान तथा सभी दीर्घ उत्तरीय प्रश्नों के उत्तर सरल एवं विस्तृत भाषा में दिए गए हैं।

UP Board Class 6 Science Chapter 7 Solution:
यहाँ "जीवों में अनुकूलन" पाठ के सभी प्रश्न-उत्तर — वास स्थान, जलीय अनुकूलन, स्थलीय अनुकूलन, मरुस्थलीय अनुकूलन एवं वायवीय अनुकूलन सरल एवं परीक्षा उपयोगी रूप में प्रस्तुत किए गए हैं।
BASIC SHIKSHA SOLUTION ● UPBOARD CLASS 6 SCIENCE SOLUTION
Basic Shiksha Solution ● बहुविकल्पीय प्रश्न
🎯 प्रश्न 1 — सही विकल्प छाँटकर अपनी अभ्यास पुस्तिका में लिखिए
(क) मेढ़क रहता है —
(i) स्थल पर
(ii) जल में
(iii) जल तथा स्थल दोनों जगह
(iv) वायु में
उत्तर: (iii) जल तथा स्थल दोनों जगह
💡 व्याख्या: मेढ़क एक उभयचर (Amphibian) जन्तु है — यह जल और स्थल दोनों स्थानों पर रह सकता है। जल में रहने पर यह त्वचा द्वारा श्वसन करता है और जमीन पर रहने पर फेफड़ों द्वारा श्वसन करता है। इसके पिछले पैरों में पादजाल (Webbed Feet) होते हैं जो इसे पानी में तैरने में सहायता करते हैं।
📌 उभयचर जन्तु: मेढ़क, कछुआ, मगरमच्छ, सैलामेंडर। ये सभी जल और स्थल दोनों पर जीवित रह सकते हैं।
(ख) मछली साँस लेती है —
(i) गलफड़ों द्वारा
(ii) फेफड़ों द्वारा
(iii) त्वचा द्वारा
(iv) पंख द्वारा
उत्तर: (i) गलफड़ों द्वारा
💡 व्याख्या: मछली गलफड़ों (Gills / क्लोम) द्वारा श्वसन करती है। जल में घुली ऑक्सीजन को गलफड़े अवशोषित करते हैं और CO₂ बाहर छोड़ते हैं। यही कारण है कि जल से बाहर निकालने पर मछली साँस नहीं ले पाती और मर जाती है। गलफड़े मछली के जलीय अनुकूलन का सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।
📌 विभिन्न जन्तुओं में श्वसन: मछली → गलफड़े | मनुष्य → फेफड़े | मेढ़क (जल में) → त्वचा | मेढ़क (स्थल पर) → फेफड़े | कीट → वायु-नलिकाएँ (Tracheae)।
(ग) ऊँट के कूबड़ में संचित होता है —
(i) वसा
(ii) कार्बोहाइड्रेट
(iii) प्रोटीन
(iv) खनिज लवण
उत्तर: (i) वसा
💡 व्याख्या: ऊँट के कूबड़ में वसा (Fat) संचित होती है। जब मरुस्थल में भोजन और पानी उपलब्ध नहीं होता तब यह संचित वसा ऊर्जा और जल दोनों में परिवर्तित हो जाती है। इसीलिए ऊँट कई दिनों तक बिना भोजन और पानी के जीवित रह सकता है। यह ऊँट के मरुस्थलीय अनुकूलन का सबसे अनोखा उदाहरण है।
📌 याद रखें: ऊँट के कूबड़ में पानी नहीं, बल्कि वसा होती है। वसा के ऑक्सीकरण से जल प्राप्त होता है।
(घ) नागफनी का पौधा है —
(i) जलीय
(ii) मरुस्थलीय
(iii) उपरिरोही
(iv) आरोही
उत्तर: (ii) मरुस्थलीय
💡 व्याख्या: नागफनी (Cactus) एक मरुस्थलीय पौधा है। इसका तना माँसल, चपटा और हरा होता है जो भोजन बनाने के साथ-साथ जल संचय का भी कार्य करता है। इसकी पत्तियाँ काँटों में रूपान्तरित हो जाती हैं जिससे वाष्पोत्सर्जन कम होता है। जड़-तन्त्र अत्यधिक फैला हुआ होता है जो मिट्टी से अधिकाधिक जल प्राप्त करता है।
📌 मरुस्थलीय पौधे: नागफनी, घीकवार (एलोवेरा), बबूल, सतावर, भड़भड़ा। इन सभी में जल संचय हेतु विशेष अनुकूलन होता है।
(ङ) जलीय वातावरण में पाया जाने वाला पौधा है —
(i) मटर
(ii) सिंघाड़ा
(iii) आलू
(iv) दूब घास
उत्तर: (ii) सिंघाड़ा
💡 व्याख्या: सिंघाड़ा एक जलीय पौधा है जो तालाबों और झीलों में पाया जाता है। इसका तना कोमल और वायुकोषयुक्त होता है जिससे यह जल में तैरता रहता है। मटर और दूब घास स्थलीय पौधे हैं जबकि आलू भूमिगत तने का रूपान्तरण है। अन्य जलीय पौधों में जलकुम्भी, कमल, वैलिसनेरिया, कुमुदिनी प्रमुख हैं।
📌 जलीय पौधे: सिंघाड़ा, जलकुम्भी, कमल, कुमुदिनी, वैलिसनेरिया, हाइड्रिला। इन सभी में वायुकोष अधिक होते हैं।
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Basic Shiksha Solution ● रिक्त स्थान पूर्ति
✍️ प्रश्न 2 — रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए
(क) मेढक पानी में श्वसन त्वचा द्वारा करता है।
💡 व्याख्या: मेढक एक उभयचर जन्तु है। जल में रहने पर यह अपनी नम, पतली और रक्त-वाहिकाओं से भरपूर त्वचा द्वारा श्वसन करता है। जल की ऑक्सीजन सीधे त्वचा से रक्त में आ जाती है। स्थल पर आने पर यही कार्य फेफड़े करते हैं।

(ख) नागफनी एक मरुस्थलीय वातावरण का पौधा है।
💡 व्याख्या: नागफनी रेगिस्तान जैसे मरुस्थलीय वातावरण में उगने वाला पौधा है। इसमें जल संचय के लिए माँसल तना, काँटेदार पत्तियाँ और गहरी फैली जड़ें — ये तीनों विशेष अनुकूलन पाए जाते हैं।

(ग) अल्प विकसित जड़ तथा वायुमृदूतक जलीय पौधों में पाया जाता है।
💡 व्याख्या: जलीय पौधों में जड़-तन्त्र अल्प विकसित होता है क्योंकि पानी और खनिज पदार्थ सीधे पौधे के किसी भी भाग से अवशोषित हो जाते हैं। साथ ही इनके तना, पर्णवृन्त तथा पत्तियों में वायुमृदूतक (Aerenchyma) — यानी वायुकोष — अधिक होते हैं जिससे पौधा स्पंजी और हल्का होकर जल में तैरता रहता है।

(घ) आलू एक भूमिगत तना है।
💡 व्याख्या: आलू देखने में जड़ जैसा लगता है किन्तु यह वास्तव में भूमिगत तने का रूपान्तरण है — इसे स्तम्भ कन्द (Stem Tuber) कहते हैं। इस पर आँखें (Nodes/Buds) होती हैं जो नए पौधों को जन्म देती हैं। इसी प्रकार अदरक और अरबी भी भूमिगत तने के रूपान्तरण हैं।

(ङ) पक्षियों की हड्डियाँ खोखली होती हैं।
💡 व्याख्या: पक्षियों की हड्डियाँ खोखली एवं वायु से भरी होती हैं। इससे उनके शरीर का भार बहुत कम हो जाता है जो उड़ने में सहायक होता है। इसके अतिरिक्त फेफड़ों से जुड़े वायुकोष भी शरीर को हल्का बनाते हैं।
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Basic Shiksha Solution ● सही / गलत
✅ प्रश्न 3 — सही (√) तथा गलत (✗) का चिह्न लगाएँ
(क) मरुस्थलीय पौधे कोमल तथा कमजोर तने वाले होते हैं।
उत्तर: गलत (✗)
💡 व्याख्या: यह कथन जलीय पौधों के बारे में सही है, मरुस्थलीय पौधों के बारे में नहीं। मरुस्थलीय पौधों जैसे नागफनी का तना माँसल, चपटा और मजबूत होता है जो जल संग्रह करता है। इसके विपरीत जलीय पौधे जलकुम्भी आदि का तना कोमल व कमजोर होता है।
📌 सुधार: सही कथन — "जलीय पौधे कोमल तथा कमजोर तने वाले होते हैं।" मरुस्थलीय पौधों का तना माँसल व मजबूत होता है।
(ख) पक्षियों की हड्डी खोखली तथा वायु से भरी होती है।
उत्तर: सही (√)
💡 व्याख्या: पक्षियों के शरीर का वायवीय वातावरण के अनुसार विशेष अनुकूलन होता है। इनकी हड्डियाँ खोखली और वायु से भरी होती हैं जिससे शरीर का भार कम रहता है। फेफड़ों से जुड़े वायुकोष और नावाकार (Streamlined) शरीर इसे और अधिक उड़ने योग्य बनाते हैं।
(ग) मृदु पौधों में जड़ अल्प विकसित होती है।
उत्तर: सही (√)
💡 व्याख्या: यहाँ "मृदु पौधों" से तात्पर्य जलीय पौधों से है। इन पौधों में जड़-तन्त्र अल्प विकसित होता है क्योंकि जल और खनिज पदार्थ पानी से सीधे अवशोषित हो जाते हैं — जड़ों द्वारा मिट्टी में गहरे उतरकर जल खोजने की आवश्यकता नहीं होती।
(घ) शरीर पर घने तथा लम्बे बाल और वसा की मोटी परत ठण्डे देश में रहने वाले जन्तुओं में वातावरण से अनुकूलन करने में सहायक होता है।
उत्तर: सही (√)
💡 व्याख्या: ध्रुवीय क्षेत्रों में रहने वाले जन्तुओं जैसे ध्रुवीय भालू, पेंगुइन, आर्कटिक लोमड़ी में घने बाल और त्वचा के नीचे वसा की मोटी परत होती है। यह वसा की परत शरीर की गर्मी को बाहर जाने से रोकती है और ठण्ड से सुरक्षा प्रदान करती है — यही इनका ठण्डे देश में अनुकूलन है।
📌 ध्रुवीय अनुकूलन: ध्रुवीय भालू → सफेद मोटे बाल (ऊष्मा सुरक्षा + छद्मावरण) | पेंगुइन → पंखों में वसा की मोटी परत।
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Basic Shiksha Solution ● मिलान कीजिए
🔗 प्रश्न 4 — सही जोड़ का मिलान कीजिए
स्तम्भ (क) स्तम्भ (ख) ✅ उत्तर
क. वायुकोष अ. मछली स. पक्षी
ख. शल्क ब. पाद जाल अ. मछली
ग. मेढ़क स. पक्षी ब. पाद जाल
घ. उपचर्म द. पंख य. जलकुम्भी
ङ. चिड़िया य. जलकुम्भी द. पंख
💡 मिलान का सारांश एवं व्याख्या: वायुकोष पक्षियों में पाए जाते हैं जो शरीर को हल्का रखते हैं। शल्क मछली के शरीर पर जलरोधी सुरक्षा प्रदान करते हैं। मेढ़क के पिछले पैरों में पाद-जाल होता है जो जल में तैरने में मदद करता है। उपचर्म (Cuticle) जलकुम्भी जैसे जलीय पौधों की सतह पर होती है जो उन्हें सड़ने से बचाती है। चिड़िया के अग्रपाद पंखों में रूपान्तरित होते हैं जो उड़ने में सहायता करते हैं।
📌 महत्वपूर्ण: उपचर्म (Cuticle) = जलरोधी मोम जैसी परत = जलीय पौधों को सड़ने से बचाती है। यह जलीय अनुकूलन का एक प्रमुख उदाहरण है।
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Basic Shiksha Solution ● दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
📝 प्रश्न 5 — अनुकूलन किसे कहते हैं? मरुस्थलीय जीवों में अनुकूलन को संक्षेप में कीजिए।
उत्तर:

अनुकूलन की परिभाषा: आकृति, आकार, रंग-रूप, संरचना तथा आवास सम्बन्धी लक्षणों में ऐसा परिवर्तन जो सजीव को विशेष पर्यावरण में सफलतापूर्वक जीवित रहने में सहायक होता है, अनुकूलन (Adaptation) कहलाता है। दूसरे शब्दों में, जीवधारियों में अपने को उपयुक्त दशाओं के अनुसार ढालने की जो क्षमता का विकास होता है, उसे अनुकूलन कहते हैं।

🌵 मरुस्थलीय जन्तुओं में अनुकूलन (ऊँट का उदाहरण)
  • ऊँट के कूबड़ में वसा संचित होती है जो आवश्यकता पड़ने पर ऊर्जा और जल में बदल जाती है।
  • लम्बे पैर शरीर को गर्म बालू से दूर रखते हैं तथा गद्देदार तलवे रेत पर आसानी से चलने में सहायक हैं।
  • खुरदरी मोटी त्वचा तेज धूप और गर्मी से सुरक्षा प्रदान करती है।
  • नासिका छिद्र बंद करने की क्षमता होती है जिससे रेतीली आँधी में धूल शरीर में नहीं जाती।
  • ऊँट एक बार में बहुत अधिक पानी पी कर शरीर में संचित कर सकता है।
🌵 मरुस्थलीय पौधों में अनुकूलन
  • तना माँसल, चपटा और हरा होता है जो भोजन बनाने के साथ-साथ जल संचय का भी कार्य करता है — जैसे नागफनी।
  • पत्तियाँ काँटों या शूलों में बदल जाती हैं जिससे वाष्पोत्सर्जन अत्यंत कम हो जाता है — जैसे नागफनी, घीकवार, सतावर।
  • जड़-तन्त्र अत्यधिक फैला हुआ और भूमि में गहराई तक जाता है जिससे अधिकाधिक जल प्राप्त हो सके।
  • कुछ पौधों में पत्तियों के रन्ध्र धँसे हुए होते हैं जिससे वाष्पोत्सर्जन कम होता है — जैसे कनेर।
💡 निष्कर्ष: मरुस्थल में पानी की कमी, तेज धूप और गर्म बालू — ये तीन मुख्य चुनौतियाँ हैं। इन्हीं चुनौतियों से निपटने के लिए मरुस्थलीय जीवों में जल-संचय, वाष्पोत्सर्जन में कमी और गर्मी से बचाव के विशेष अनुकूलन विकसित हुए हैं।
📌 परीक्षा उपयोगी: ऊँट को "मरुस्थल का जहाज" कहते हैं — इसके विशेष अनुकूलन इसे रेगिस्तान में जीवित रखते हैं।
📝 प्रश्न 6 — जलीय जीवों में अनुकूलन की विशेषता को संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:

जलीय जीव वे प्राणी और पौधे हैं जो जल में रहते हैं। इनके शरीर में जलीय वातावरण के अनुसार विशेष अनुकूलन होते हैं —

🐟 जलीय जन्तुओं में अनुकूलन (मछली का उदाहरण)
  • मछली का शरीर धारा-रेखित (Streamlined) — नाव के आकार का होता है जो जल में तेज गति से तैरने में सहायक है।
  • शरीर पर जलरोधी शल्क (Scales) होते हैं जो जल से सुरक्षा प्रदान करते हैं।
  • श्वसन के लिए गलफड़े / क्लोम (Gills) होते हैं जो जल में घुली ऑक्सीजन ग्रहण करते हैं।
  • तैरने के लिए चपटे पंख (Fins) होते हैं जो दिशा-परिवर्तन में सहायक हैं।
  • गर्दन का अभाव होता है — इससे शरीर और अधिक धारा-रेखित हो जाता है।
  • आँखों पर निमेषक पटल (Nictitating Membrane) होती है जो जल में आँखों की रक्षा करती है।
🌿 जलीय पौधों में अनुकूलन
  • इन पौधों का शरीर कोमल और कमजोर होता है — काष्ठीय ऊतक अत्यंत अल्प होता है।
  • तना, पर्णवृन्त तथा पत्तियों में अधिक वायुकोष (Aerenchyma) होते हैं जिससे पौधा स्पंजी, हल्का और तैरने में सक्षम रहता है।
  • पत्तियाँ पतली, कटी-फटी या तैरने की अवस्था में होती हैं तथा इनमें प्राय: रन्ध्र का अभाव होता है।
  • जड़-तन्त्र अल्प विकसित होता है।
  • पौधे के सभी भागों पर जलरोधी उपचर्म (Cuticle) की पर्त होती है जो सड़ने से बचाती है।
💡 उदाहरण: जलीय जन्तु — मछली, मेढ़क, मगरमच्छ, जलीय कीट। जलीय पौधे — सिंघाड़ा, जलकुम्भी, कमल, कुमुदिनी, वैलिसनेरिया, हाइड्रिला।
📝 प्रश्न 7 — उभयचर जीवों में अनुकूलन को संक्षेप में उदाहरण सहित बताइए।
उत्तर:

वे जन्तु जो जल तथा स्थल दोनों स्थानों पर रह सकते हैं, उभयचर (Amphibians) कहलाते हैं। इनके शरीर में जल और स्थल दोनों वातावरणों के अनुसार अनुकूलन होते हैं। उभयचर का सबसे अच्छा उदाहरण मेढ़क (Frog) है।

🐸 मेढ़क में उभयचर अनुकूलन
  • श्वसन का दोहरा तरीका: जल में रहने पर नम त्वचा द्वारा तथा स्थल पर रहने पर फेफड़ों द्वारा श्वसन करता है।
  • पिछले पैरों में पादजाल (Webbed Feet): पैरों की उँगलियों के बीच त्वचा की झिल्ली होती है जो जल में तैरने में सहायता करती है।
  • लम्बी और मजबूत पिछली टाँगें: स्थल पर लम्बी छलाँग लगाने में सहायक होती हैं।
  • नम और पतली त्वचा: गैस-विनिमय के लिए उपयुक्त तथा जल में सड़ने से बचाने वाली श्लेष्मा से ढकी होती है।
  • मेढ़क का शरीर धारा-रेखित होता है जो जल में आसानी से गतिमान होने में सहायता करता है।
💡 अन्य उभयचर जन्तु: कछुआ, मगरमच्छ, सैलामेंडर, टोड। ये सभी जल और स्थल दोनों पर जीवित रह सकते हैं और इनमें दोनों वातावरणों के अनुसार विशेष अनुकूलन होते हैं।
📌 याद रखें: उभयचर = जल + स्थल दोनों। मेढ़क का प्रजनन (अण्डे देना) जल में ही होता है।
📝 प्रश्न 8 — वायवीय जन्तुओं में अनुकूलन का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:

वे जन्तु जो वायु में उड़ते हैं, वायवीय (Aerial) जन्तु कहलाते हैं। इनके शरीर में उड़ने के लिए विशेष अनुकूलन होते हैं। वायवीय जन्तुओं में मुख्यतः पक्षी और कीट आते हैं।

🦅 पक्षियों में वायवीय अनुकूलन
  • शरीर का आकार नौकाकार (Boat-shaped) और धारा-रेखित होता है जो वायु-प्रतिरोध कम करता है।
  • अग्रपाद पंखों में रूपान्तरित होते हैं जो उड़ने में सहायता करते हैं।
  • हड्डियाँ खोखली एवं वायु से भरी होती हैं जिससे शरीर का भार अत्यंत कम हो जाता है।
  • फेफड़ों से जुड़े वायुकोष (Air Sacs) में हवा भर जाती है जो उड़ते समय शरीर को हल्का रखते हैं।
  • उदाहरण — तोता, कबूतर, गौरैया, चील, बाज।
🦋 कीटों में वायवीय अनुकूलन
  • कीटों का शरीर छोटा और हल्का होता है।
  • उड़ते समय दो जोड़ी पंख फैल जाते हैं।
  • शरीर में वायु-नलिकाएँ (Tracheae) होती हैं जिनसे हवा भरती और निकलती है — इससे शरीर हल्का हो जाता है।
  • उदाहरण — तितली, मधुमक्खी, घरेलू मक्खी, मच्छर।
💡 पक्षियों और कीटों में मुख्य अन्तर: पक्षियों में खोखली हड्डियाँ और वायुकोष होते हैं जबकि कीटों में शरीर की वायु-नलिकाएँ (Tracheae) यह कार्य करती हैं। दोनों का लक्ष्य एक ही है — शरीर को हल्का बनाकर उड़ान को सम्भव बनाना।
📝 प्रश्न 9 — मदार किस वातावरण में उगने वाला पौधा है?
उत्तर:

मदार (Calotropis) एक मरुस्थलीय / शुष्क स्थलीय वातावरण में उगने वाला पौधा है। यह बंजर भूमि, रेतीले मैदानों और कम वर्षा वाले क्षेत्रों में पाया जाता है। मदार के पत्ते मोटे और माँसल होते हैं तथा इनकी सतह पर मोमी परत होती है जो वाष्पोत्सर्जन को कम करती है। यह पौधा कम पानी में भी जीवित रह सकता है — यही इसका मरुस्थलीय अनुकूलन है।

📌 मदार की पहचान: यह सफेद या हल्के बैंगनी फूलों वाला झाड़ीनुमा पौधा है जो बंजर और सूखी भूमि पर अनायास उग आता है।
📝 प्रश्न 10 — कोई दो उभयचर जन्तुओं के नाम लिखिए।
उत्तर:

दो प्रमुख उभयचर जन्तु हैं —

  • मेढ़क (Frog) — जल में त्वचा द्वारा और स्थल पर फेफड़ों द्वारा श्वसन करता है। पिछले पैरों में पादजाल होता है।
  • कछुआ (Tortoise/Turtle) — यह जल और स्थल दोनों पर रहता है। इसकी सख्त कवच (Shell) इसे दोनों वातावरणों में सुरक्षा प्रदान करती है।
📋 अन्य उभयचर: मगरमच्छ (Crocodile), टोड (Toad), सैलामेंडर (Salamander)।
📝 प्रश्न 11 — जलीय अनुकूलन में पंख की भूमिका बताइए।
उत्तर:

मछली में पंख (Fins) जलीय अनुकूलन का एक महत्वपूर्ण अंग हैं। पंख की भूमिका निम्नलिखित है —

  • तैरने में सहायता: चपटे पंख जल में आगे बढ़ने के लिए आवश्यक धकेलने की शक्ति उत्पन्न करते हैं।
  • दिशा-नियन्त्रण: पंखों की सहायता से मछली जल में ऊपर, नीचे, दाएँ और बाएँ मुड़ सकती है।
  • सन्तुलन बनाए रखना: पंख मछली को जल में स्थिर और सन्तुलित रखते हैं ताकि वह पलट न जाए।
  • मछली का धारा-रेखित शरीर और चपटे पंख मिलकर उसे जल में अधिकतम गति से चलने में सक्षम बनाते हैं।
📌 याद रखें: पंख = जलीय अनुकूलन (मछली में तैरने के लिए) | पंख = वायवीय अनुकूलन (पक्षियों में उड़ने के लिए)। दोनों अलग-अलग हैं!
📝 प्रश्न 12 — अपने आस-पास भ्रमण करके जलीय, स्थलीय व वायवीय पक्षियों एवं पौधों के नाम लिखिए।
उत्तर:
वर्ग पक्षियों के नाम पौधों के नाम
जलीय बगुला, बत्तख, क्रेन, जलमुर्गी, किंगफिशर कमल, जलकुम्भी, सिंघाड़ा, कुमुदिनी, वैलिसनेरिया
स्थलीय मोर, तीतर, गौरैया, कबूतर, कौआ नीम, आम, तुलसी, सरसों, मक्का
वायवीय चील, बाज, गिद्ध, तोता, अबाबील
💡 नोट: अधिकांश पक्षी वायवीय होते हैं परन्तु उनका निवास-स्थान (जल, स्थल, वन) के अनुसार उन्हें वर्गीकृत किया गया है। जलीय पक्षी जल के समीप रहते हैं और जल से भोजन प्राप्त करते हैं। पौधों में वायवीय वर्ग नहीं होता — पौधे स्थल या जल में ही उगते हैं।
📝 प्रश्न 13 — मरुस्थलीय अनुकूलन के लिए ऊँट में किस प्रकार की विशेषताएँ पायी जाती हैं?
उत्तर:

ऊँट को "मरुस्थल का जहाज" कहा जाता है क्योंकि इसमें रेगिस्तान की कठोर परिस्थितियों से निपटने के लिए अनेक विशेष अनुकूलन पाए जाते हैं —

  • कूबड़ में वसा का संचय: आवश्यकता पड़ने पर यह वसा ऊर्जा और जल में परिवर्तित हो जाती है। इसीलिए ऊँट कई दिनों तक भोजन-पानी के बिना जीवित रह सकता है।
  • लम्बे पैर: शरीर को गर्म बालू की सतह से ऊँचा रखते हैं जिससे अधिक गर्मी नहीं लगती।
  • गद्देदार मोटे तलवे: गर्म और मुलायम रेत पर चलने में सहायता करते हैं — पाँव रेत में धँसते नहीं।
  • खुरदरी और मोटी त्वचा: तेज धूप और गर्मी से शरीर की सुरक्षा करती है।
  • नासिका छिद्र बंद करने की क्षमता: रेतीली आँधी के समय नाक बंद कर लेता है।
  • एक साथ अधिक जल पीने की क्षमता: ऊँट एक बार में 100-200 लीटर तक पानी पी सकता है और शरीर में संचित कर सकता है।
💡 सारांश: ऊँट में जल-संचय (कूबड़), गर्मी से सुरक्षा (मोटी त्वचा), रेत पर चलना (गद्देदार तलवे) और धूल से बचाव (बंद नासिका) — ये चारों मिलकर मरुस्थल में जीवित रहने के लिए एक सम्पूर्ण अनुकूलन-तन्त्र बनाते हैं।
📝 प्रश्न 14 — पक्षियों में उड़ने के लिए अनुकूलन किन विशेषताओं के कारण होता है?
उत्तर:

पक्षियों का शरीर वायवीय वातावरण के अनुकूल होता है। उड़ने के लिए निम्नलिखित विशेष अनुकूलन पक्षियों में पाए जाते हैं —

  • नावाकार और धारा-रेखित शरीर: शरीर का यह आकार वायु-प्रतिरोध को कम करता है जिससे कम ऊर्जा में अधिक दूरी तय होती है।
  • अग्रपाद का पंखों में रूपान्तरण: हाथ की जगह पंख होते हैं जो उड़ने का मुख्य आधार हैं।
  • खोखली हड्डियाँ: हड्डियाँ हल्की और वायु से भरी होती हैं जिससे शरीर का कुल भार बहुत कम हो जाता है।
  • वायुकोष (Air Sacs): फेफड़ों से जुड़े वायुकोषों में हवा भर जाती है जो उड़ते समय शरीर को और अधिक हल्का रखती है।
  • शक्तिशाली उड़ान पेशियाँ: छाती की मजबूत पेशियाँ पंखों को ऊपर-नीचे चलाने का बल प्रदान करती हैं।
💡 निष्कर्ष: शरीर को हल्का बनाना (खोखली हड्डियाँ + वायुकोष) और पंखों को शक्तिशाली बनाना (उड़ान पेशियाँ) — ये दो मुख्य सिद्धान्त पक्षियों के वायवीय अनुकूलन का आधार हैं। तोता, कबूतर, गौरैया, चील सभी इन विशेषताओं से युक्त हैं।
📌 विशेष तथ्य: पक्षियों का यह विशेष रूपान्तरण — अग्रपाद का पंख में बदलना — केवल पक्षियों में ही होता है, अन्य किसी जन्तु में नहीं।
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❓ FAQs — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न: अनुकूलन क्या होता है?
उत्तर: किसी जीव के शरीर की संरचना, आकार या व्यवहार में ऐसा परिवर्तन जो उसे विशेष वातावरण में सफलतापूर्वक जीवित रहने में सहायता करे, अनुकूलन कहलाता है।

प्रश्न: ऊँट के कूबड़ में क्या होता है?
उत्तर: ऊँट के कूबड़ में वसा (Fat) संचित होती है। यह वसा आवश्यकता पड़ने पर ऊर्जा और जल में परिवर्तित हो जाती है, इसीलिए ऊँट कई दिनों तक बिना पानी के जीवित रह सकता है।

प्रश्न: मेढ़क उभयचर क्यों है?
उत्तर: मेढ़क जल और स्थल दोनों पर रह सकता है — जल में त्वचा द्वारा और स्थल पर फेफड़ों द्वारा श्वसन करता है। इसीलिए इसे उभयचर कहते हैं।

प्रश्न: UP Board Class 6 Science Chapter 7 Solution कहाँ मिलेगा?
उत्तर: Basic Shiksha Solution वेबसाइट पर इस अध्याय का सम्पूर्ण समाधान सरल हिन्दी में उपलब्ध है।
🔎 निष्कर्ष
निष्कर्ष: इस प्रकार UP Board Class 6 Science Chapter 7 जीवों में अनुकूलन Solution में हमने वास स्थान की परिभाषा, जलीय अनुकूलन (मछली, जलकुम्भी), स्थलीय अनुकूलन, मरुस्थलीय अनुकूलन (ऊँट, नागफनी), उभयचर अनुकूलन (मेढ़क) तथा वायवीय अनुकूलन (पक्षी, कीट) को विस्तार से समझा। यह अध्याय परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
📚 अतिरिक्त अध्ययन सामग्री

विभिन्न वातावरणों में अनुकूलन का तुलनात्मक अध्ययन:

वातावरण विशेषताएँ उदाहरण
मरुस्थलीय कम जल, उच्च तापमान, वसा संचय, गहरी जड़ें ऊँट, नागफनी, मदार
जलीय गलफड़े, पंख, धारारेखित शरीर, वायुकोष मछली, कमल, सिंघाड़ा
उभयचर दोहरी श्वसन, पाद जाल, नम त्वचा मेढ़क, कछुआ, मगरमच्छ
वायवीय खोखली हड्डियाँ, पंख, हल्का शरीर कबूतर, तितली, चिड़िया
स्थलीय मजबूत पैर, फेफड़े, विकसित अंग गाय, घोड़ा, नीम, आम
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