इकाई 5 — तन्तु से वस्त्र तक
UP Board Class 6 | विज्ञान | सम्पूर्ण हिन्दी समाधान
BASIC SHIKSHA SOLUTION ● UP BOARD CLASS 6 SCIENCE SOLUTION
📖 पाठ परिचय: हम जो कपड़े पहनते हैं वे कहाँ से आते हैं? इस इकाई में हम इस पूरी यात्रा को समझेंगे — तन्तु/रेशे → धागा → कपड़ा → वस्त्र। कपास (रूई) और जूट दो प्रमुख पादप रेशे हैं। इनकी खेती के लिए उचित मिट्टी और जलवायु की आवश्यकता होती है। रेशों से धागा बनाने की प्रक्रिया कताई, धागों से वस्त्र बनाने की प्रक्रिया बुनाई और बंधाई कहलाती है। इस इकाई में वस्त्र सामग्री के इतिहास की भी रोचक जानकारी मिलती है।
प्रश्न 1 (क): ऊन प्राप्त नहीं होते हैं —
(i) भेड़ के बालों से
(ii) ऊँट के बालों से
(iii) याक के बालों से
(iv) लंगूर के बालों से
✅ सही उत्तर: (iv) लंगूर के बालों से
व्याख्या: ऊन एक जांतव रेशा है जो विभिन्न पशुओं के बालों से प्राप्त होता है। भेड़, ऊँट, याक, खरगोश (अंगोरा) और कश्मीरी बकरी (पशमीना) सभी से ऊन प्राप्त की जाती है।
लंगूर से ऊन क्यों नहीं —
लंगूर एक वानर (बंदर) है। उसके बाल ऊन की तरह मुलायम, लंबे और कताई योग्य नहीं होते। इसलिए उससे ऊन प्राप्त नहीं होती।
📌 याद रखें: भेड़ → मेरिनो ऊन। याक → ठंडे पहाड़ी क्षेत्रों में। ऊँट → राजस्थान में।
रेशम → रेशम कीट के कोकून से। ये दोनों जांतव (animal) रेशे हैं।
प्रश्न 1 (ख): कृत्रिम रेशा है —
(i) रूई
(ii) जूट
(iii) नायलॉन
(iv) फ्लैक्स
✅ सही उत्तर: (iii) नायलॉन
व्याख्या: रूई, जूट और फ्लैक्स (अलसी) — तीनों प्राकृतिक पादप रेशे हैं जो सीधे पौधों से प्राप्त होते हैं। नायलॉन एक संश्लेषित (synthetic) रेशा है जिसे मनुष्य द्वारा पेट्रोलियम उत्पादों के जटिल रासायनिक परिवर्तनों के पश्चात कृत्रिम रूप से बनाया जाता है।
अन्य संश्लेषित रेशे —
पॉलिएस्टर, रेयान, एक्रिलिक — ये सभी कृत्रिम/संश्लेषित रेशे हैं।
📌 याद रखें: प्राकृतिक रेशे = पेड़-पौधों या जंतुओं से। कृत्रिम रेशे = प्रयोगशाला/कारखाने में पेट्रोलियम से।
प्रश्न 1 (ग): कपास द्वारा निर्मित सामग्री है —
(i) डलिया
(ii) कागज
(iii) रस्सी
(iv) बोरा
✅ सही उत्तर: (ii) कागज
व्याख्या: कपास से सूती कपड़े, चादर, पर्दे, रूई, कागज आदि बनाए जाते हैं। विशेष प्रकार के उच्च गुणवत्ता वाले कागज जैसे करेंसी नोट के कागज, सिगरेट पेपर आदि कपास के रेशों से बनते हैं।
अन्य विकल्प गलत क्यों —
डलिया और बोरा — जूट से बनते हैं। रस्सी — जूट, नारियल जटा से बनती है।
📌 याद रखें: कपास = सूती कपड़े + रूई + कागज। जूट = बोरा + रस्सी + डलिया + टाट।
प्रश्न 1 (घ): एकल धागे से वस्त्र निर्माण की प्रक्रिया कहलाती है —
(i) रेटिंग
(ii) कताई
(iii) बुनाई
(iv) बंधाई
✅ सही उत्तर: (iv) बंधाई
व्याख्या: बंधाई (Knitting) वह प्रक्रिया है जिसमें एक ही धागे को परस्पर फंदों में गूँथकर वस्त्र तैयार किया जाता है। जब किसी मोजे या बनियान का एक धागा खींचा जाता है तो पूरा वस्त्र उधड़ने लगता है — यही बंधाई का प्रमाण है।
बुनाई से अंतर —
बुनाई में धागों के दो सेट आपस में विनत (cross) होते हैं, जबकि बंधाई में एकल धागे से फंदे बनाए जाते हैं।
📌 याद रखें: बुनाई = दो धागों के सेट (साड़ी, धोती)। बंधाई = एकल धागा (स्वेटर, मोजे, बनियान)।
BASIC SHIKSHA SOLUTION ● UP BOARD CLASS 6 SCIENCE SOLUTION
(अ) धागों की बुनाई और बंधाई से वस्त्र बनाए जाते हैं।
✅ सत्य (√)
व्याख्या: वस्त्र बनाने की दो मुख्य विधियाँ हैं — बुनाई (जिसमें धागों के दो सेट आपस में विनत होते हैं) और बंधाई (जिसमें एकल धागे से फंदे बनाए जाते हैं)। इन दोनों विधियों से विभिन्न प्रकार के वस्त्र तैयार किये जाते हैं।
(ब) तन्तु धागों से मिलकर बनते हैं।
❌ असत्य (✗)
व्याख्या: यह कथन उल्टा है। वास्तव में धागा तन्तुओं/रेशों से मिलकर बनता है, न कि तन्तु धागों से। सही क्रम यह है —
सही क्रम —
तन्तु/रेशा → धागा → कपड़ा → वस्त्र। यानी तन्तु सबसे छोटी इकाई है जो मिलकर धागा बनाती है।
📌 याद रखें: सूती कपड़े का एक धागा खींचकर उसे नाखून से खरोंचने पर वह कई पतली लड़ियों (तन्तुओं) में विभाजित हो जाता है।
(स) जूट प्राप्त करने के लिए पटसन की फसल को पुष्पन अवस्था में काटते हैं।
✅ सत्य (√)
व्याख्या: पटसन की फसल को पुष्पन अवस्था (जब पीले फूल दिखने लगें) में ही काटा जाता है क्योंकि इसी अवस्था में तने के रेशे सबसे अधिक लचीले और मजबूत होते हैं।
देर से काटने का नुकसान —
अधिक समय बीतने पर पटसन के तने कड़े हो जाते हैं जिससे जूट के रेशे निकालना कठिन और गुणवत्ता खराब हो जाती है।
(द) रेशम कीट के कोकून से रेशम का धागा प्राप्त किया जाता है।
✅ सत्य (√)
व्याख्या: रेशम कीट (Bombyx mori) अपने चारों ओर एक निरंतर धागे को लपेटकर कोकून बनाता है। यह धागा 300 से 900 मीटर तक लंबा हो सकता है। कोकून को गर्म पानी में डुबोकर इस धागे को खोला जाता है और रेशम प्राप्त किया जाता है।
अतिरिक्त जानकारी —
रेशम पालन की प्रक्रिया को रेशम कृषि (Sericulture) कहते हैं। भारत में कर्नाटक, असम और पश्चिम बंगाल इसके प्रमुख उत्पादक राज्य हैं।
(य) कपास की खेती के लिए बलुई मिट्टी उपयुक्त होती है।
❌ असत्य (✗)
व्याख्या: कपास की खेती के लिए काली मिट्टी (रेगर मिट्टी) सबसे उपयुक्त होती है, बलुई मिट्टी नहीं। काली मिट्टी में नमी को अपने अंदर बनाए रखने की विशेष क्षमता होती है जो कपास के लिए बहुत लाभकारी है।
कपास की खेती की आवश्यकताएँ —
काली मिट्टी + उष्ण जलवायु (21°C से 27°C तापमान) + सामान्य वर्षा।
📌 याद रखें: कपास = काली मिट्टी। जूट/पटसन = कछार/जलोढ़ मिट्टी (नदी किनारे की उपजाऊ मिट्टी)।
BASIC SHIKSHA SOLUTION ● UP BOARD CLASS 6 SCIENCE SOLUTION
(अ) पादप रेशे ................. और ................. हैं।
✅ उत्तर: रूई (कपास) और जूट
व्याख्या: पादप रेशे वे रेशे हैं जो पौधों के विभिन्न भागों से प्राप्त होते हैं। रूई कपास पौधे के बीजों (बिनौलों) से और जूट पटसन/सनई पौधे के तनों से प्राप्त होती है। ये दोनों प्रमुख पादप रेशे हैं।
अन्य पादप रेशे —
फ्लैक्स (अलसी के तने से) और नारियल जटा (नारियल के फल से) भी पादप रेशे हैं।
(ब) ................. और ................. जंतु रेशे हैं।
✅ उत्तर: ऊन और रेशम
व्याख्या: जंतुओं से प्राप्त रेशे जांतव रेशे कहलाते हैं। ऊन भेड़ के बालों से और रेशम रेशम कीट के कोकून से प्राप्त किया जाता है। दोनों प्राकृतिक रेशे हैं।
(स) कपास के बीज से ................. प्राप्त किया जाता है।
✅ उत्तर: रूई (कपास रेशा)
व्याख्या: कपास पौधे के बीजों को बिनौला कहते हैं। प्रत्येक बिनौले की सतह से अनेकानेक सफेद रंग के रेशे निकलते हैं। कपास गोलक (बॉल) के फटने पर ये रेशे दिखाई देते हैं। इन्हीं रेशों को हम रूई कहते हैं।
बोनस जानकारी —
बिनौले से तेल भी निकाला जाता है और तेल निकालने के बाद बचे अपशिष्ट को पशुओं के चारे के रूप में उपयोग किया जाता है।
(द) ................. के तने से जूट के रेशे प्राप्त किए जाते हैं।
✅ उत्तर: पटसन (सनई)
व्याख्या: जूट पटसन (सनई) पौधे के तने से प्राप्त होता है। पटसन के पौधे 8-10 फुट लंबे होते हैं। पुष्पन अवस्था में काटकर तनों को पानी में डुबोया जाता है जिससे मुलायम भाग गल जाता है और रेशे अलग हो जाते हैं।
उत्तर — सही जोड़े:
| स्तम्भ (क) | स्तम्भ (ख) — सही जोड़ा |
| (क) पानी में पटसन के तनों को गलाना |
रेटिंग
पटसन के तनों को 4-5 दिन पानी में डुबोकर रखा जाता है जिससे बैक्टीरिया मुलायम भाग को गला देते हैं — यह रेटिंग है।
|
| (ख) कपास गोलक से कपास के बीज को निकालना |
कपास ओटना
कपास गोलक से रेशेयुक्त कपास के बीज (बिनौला) को पृथक करने की प्रक्रिया कपास ओटना कहलाती है।
|
| (ग) दो धागों की सहायता से वस्त्र बनाने की क्रिया |
बंधाई
दो सलाइयों की सहायता से धागे को बुना जाता है — यह बंधाई है। स्वेटर इसी विधि से बनता है।
|
| (घ) तन्तु से धागों को बनाना |
कताई
रेशों को खींचकर ऐंठन देने की प्रक्रिया कताई है। तकली और चरखा इसी के उपकरण हैं।
|
| (ड़) एकल धागे से वस्त्र बनाने की क्रिया |
बुनाई
धागों के दो सेट को आपस में विनत करके वस्त्र बनाने की प्रक्रिया बुनाई है। हथकरघा और पावर लूम इसी में प्रयुक्त होते हैं।
|
📌 नोट: पाठ्यपुस्तक में स्तम्भ (ख) में "कताई, बुनाई, बंधाई, रेटिंग, कपास ओटना" दिये गये हैं। ऊपर दिये गये जोड़े पाठ की सामग्री के अनुसार सही हैं।
BASIC SHIKSHA SOLUTION ● UP BOARD CLASS 6 SCIENCE SOLUTION
दिए गए रेशे हैं: नायलॉन, जूट, ऊन, रूई, रेशम, फ्लैक्स, पॉलिएस्टर
| रेशे का प्रकार | रेशों के नाम | स्रोत |
| पादप रेशे (Plant Fibres) |
जूट, रूई (कपास), फ्लैक्स (अलसी) |
पौधों के तने, बीज, फल से |
| जांतव रेशे (Animal Fibres) |
ऊन, रेशम |
भेड़ के बाल, रेशम कीट के कोकून से |
| संश्लेषित रेशे (Synthetic Fibres) |
नायलॉन, पॉलिएस्टर |
पेट्रोलियम उत्पादों से रासायनिक परिवर्तन द्वारा |
📌 याद रखें: प्राकृतिक रेशे = पादप + जांतव (दोनों प्रकृति से मिलते हैं)।
संश्लेषित रेशे = कारखाने में बनाए जाते हैं, जल्दी नहीं जलते, टिकाऊ होते हैं लेकिन पसीना नहीं सोखते।
उत्तर:
1. रूई (कपास)
रूई कपास पौधे से प्राप्त होती है। यह कपास पौधे के बीजों (बिनौलों) से प्राप्त होती है। कपास पौधे का फल पूरी तरह पकने पर फट जाता है और उसके अंदर के 3-4 बिनौलों की सतह से सफेद रंग के रेशे — जिन्हें कपास गोलक कहते हैं — दिखाई देते हैं। इन्हीं गोलकों को चुनकर रूई प्राप्त की जाती है।
कपास ओटना —
कपास के गोलकों से बिनौला (बीज) को पृथक करने की क्रिया कपास ओटना कहलाती है।
2. जूट
जूट पटसन (सनई) पौधे से प्राप्त होता है। यह पौधे के तने से प्राप्त होता है। पटसन की फसल पुष्पन अवस्था में काटी जाती है, तनों को पानी में डुबोया जाता है (रेटिंग), मुलायम भाग गल जाता है और रेशे अलग कर लिये जाते हैं।
जूट रेशे की विशेषता —
6-8 फुट लंबे, हल्के पीले रंग के, चिकने और कपास की तुलना में अधिक मजबूत होते हैं।
📌 याद रखें: रूई = कपास के बीज से। जूट = पटसन के तने से।
संक्षेप में — "रूई बीज, जूट तना।"
उत्तर — रेटिंग प्रक्रिया (Retting Process):
पटसन के तने से जूट के रेशे प्राप्त करने की प्रक्रिया को रेटिंग (Retting) कहते हैं। यह एक जैविक (बैक्टीरियल) प्रक्रिया है। इसके चरण इस प्रकार हैं —
चरण 1 — फसल कटाई
पटसन की फसल को पुष्पन अवस्था में काटा जाता है। इस समय पीले फूल दिखाई देने लगते हैं। इसी अवस्था में तने के रेशे सबसे अधिक लचीले और मजबूत होते हैं।
चरण 2 — पत्तियाँ साफ करना
कटे हुए पटसन पौधे की शाखाओं तथा पत्तियों को साफ करके तनों के बंडल बाँधे जाते हैं।
चरण 3 — पानी में डुबोना (रेटिंग)
बंडलों को किसी तालाब अथवा धीमे बहते जल में 4-5 दिनों के लिए डुबोकर रखा जाता है। पानी में उपस्थित जीवाणु (बैक्टीरिया) तने के मुलायम भाग को गला देते हैं और रेशे दिखाई देने लगते हैं।
नोट —
यह प्रक्रिया जैविक है। जीवाणु ही सारा काम करते हैं — इसलिए बिना बैक्टीरिया वाले बहते पानी में यह प्रक्रिया धीमी होती है।
चरण 4 — रेशे निकालना
गले हुए पटसन के तनों को हाथ से झटका देकर पीटा जाता है। इसके पश्चात जूट के तन्तुओं को खींचकर निकाला जाता है।
प्राप्त रेशे की विशेषता —
6-8 फुट लंबे, हल्के पीले रंग के, चिकने और मजबूत।
📌 याद रखें: रेटिंग = पटसन के तने को पानी में गलाने की जैविक प्रक्रिया। यह जीवाणुओं द्वारा होती है।
कपास ओटना = कपास गोलक से बिनौला अलग करना। दोनों अलग-अलग प्रक्रियाएँ हैं।
उत्तर:
रेशों से धागा बनाने में कताई इसलिए आवश्यक है क्योंकि अकेले रेशे बहुत कमजोर और छोटे होते हैं — उन्हें सीधे वस्त्र बनाने के लिए उपयोग नहीं किया जा सकता।
कताई का वैज्ञानिक कारण
जब रेशों को एक-दूसरे के साथ ऐंठन (twist) दी जाती है तो रेशे पास-पास आ जाते हैं और आपस में लिपट जाते हैं। इससे उनके बीच घर्षण बल बढ़ जाता है। यही घर्षण धागे को मजबूती देता है।
प्रयोग द्वारा प्रमाण —
यदि रूई के दो टुकड़े लिए जाएँ — एक जिसे ऐंठन दी गई हो और दूसरा जिसे नहीं — तो ऐंठन वाले टुकड़े को तोड़ने के लिए अधिक बल लगाना पड़ता है। यही कताई की उपयोगिता है।
कताई के उपकरण
पारम्परिक रूप से तकली (हस्त तकुआ) का उपयोग कताई के लिए होता था। महात्मा गाँधी ने चरखे को लोकप्रिय बनाया। आधुनिक समय में बड़े कारखानों में मशीनों से कताई होती है।
चरखे का महत्व —
स्वतंत्रता आंदोलन में महात्मा गाँधी ने ब्रिटेन के मिलों में आयातित कपड़ों का बहिष्कार किया और चरखे द्वारा हाथ के कते धागों से बनी वस्तुओं को खादी नाम दिया।
📌 याद रखें: कताई = ऐंठन से रेशों को मजबूत धागे में बदलना। ऐंठन अधिक = धागा अधिक मजबूत।
बिना कताई के रेशे कमजोर = वस्त्र नहीं बन सकते।
उत्तर — कपास से सूती वस्त्र बनाने की पूरी प्रक्रिया:
चरण 1 — कपास की खेती एवं चयन
कपास के बीज बसंत ऋतु से पहले खेतों में बोए जाते हैं। लगभग 2 माह बाद कपास की झाड़ी तैयार होती है। परिपक्व कपास गोलकों को हस्त चयन (हाथ से चुनना) द्वारा प्राप्त किया जाता है।
चरण 2 — कपास ओटना (Ginning)
कपास गोलकों से बिनौला (बीज) को पृथक करने की प्रक्रिया कपास ओटना कहलाती है। पारम्परिक रूप से हाथ से और आजकल मशीनों से यह कार्य होता है। इसके बाद शुद्ध रूई प्राप्त होती है।
चरण 3 — रूई की सफाई और धुनाई
रूई को साफ करके धुना जाता है ताकि रेशे फूलकर अलग-अलग हो जाएँ। इससे कताई आसान हो जाती है।
चरण 4 — कताई (Spinning)
रूई के रेशों को खींचकर ऐंठन दी जाती है जिससे सूती धागा बनता है। यह कताई प्रक्रिया तकली, चरखे या मशीनों से होती है। धागों को रील पर लपेटा जाता है।
सूत्र याद रखें —
रेशा/तन्तु → (कताई) → धागा।
चरण 5 — बुनाई (Weaving)
धागों के दो सेट को हथकरघे (Handloom) या पावर लूम (Power Loom) में आपस में विनत (एक ऊपर-एक नीचे) करके कपड़ा तैयार किया जाता है।
चरण 6 — रंगाई, छपाई और सिलाई
बने कपड़े को आवश्यकतानुसार रंगा जाता है, उस पर डिजाइन छापी जाती है और सिलाई करके वस्त्र तैयार किया जाता है।
अंतिम क्रम —
कपास गोलक → कपास ओटना → धुनाई → कताई (धागा) → बुनाई/बंधाई (कपड़ा) → रंगाई/सिलाई → वस्त्र।
📌 परीक्षा में याद रखें: तन्तु/रेशा → धागा → कपड़ा → वस्त्र — यही मूल क्रम है।
कपास (रूई) के दो उपयोग
उपयोग 1 — कपास के रेशों से सूती कपड़े, चादर, पर्दे आदि बनाए जाते हैं। सूती वस्त्र पसीना अच्छी तरह सोखते हैं इसलिए गर्मियों में अत्यन्त उपयुक्त होते हैं।
उपयोग 2 —
कपास से विशेष प्रकार के कागज (जैसे करेंसी नोट का कागज, सिगरेट पेपर) बनाए जाते हैं। इसके अलावा गद्दे, तकिए, रजाई में रूई भरी जाती है।
जूट के दो उपयोग
उपयोग 1 — जूट से रस्सी, डलिया, बोरा, टाट, पर्दे और दरी बनाई जाती हैं। अनाज और सब्जियों के बोरे जूट के ही बने होते हैं।
उपयोग 2 —
आजकल जूट से सजावट की अनेक सामग्री भी बनती है जैसे थैले, फूलदान, दीवार सज्जा सामग्री आदि। जूट एक पर्यावरण-अनुकूल रेशा है क्योंकि यह पूरी तरह जैव-अपघटनीय (biodegradable) है।
📌 याद रखें: कपास = मुलायम, सफेद, नमी सोखने वाला = कपड़े, रूई, कागज।
जूट = मजबूत, पीला, खुरदरा = बोरा, रस्सी, डलिया। जूट को "सोने का रेशा (Golden Fibre)" भी कहते हैं।
BASIC SHIKSHA SOLUTION ● UP BOARD CLASS 6 SCIENCE SOLUTION
| गुण | कपास (रूई) | जूट (पटसन) |
| पौधे का नाम | कपास (Cotton) | पटसन / सनई (Jute) |
| प्राप्ति का भाग | बीज (बिनौला) से | तने से |
| उपयुक्त मिट्टी | काली मिट्टी (रेगर) | कछार/जलोढ़ मिट्टी |
| उपयुक्त जलवायु | उष्ण (21°C-27°C) | आर्द्र, वर्षा ऋतु |
| प्रमुख राज्य | महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु | पश्चिम बंगाल, असम, बिहार |
| रेशा प्राप्त करने की विधि | कपास ओटना (Ginning) | रेटिंग (Retting) |
| रेशे का रंग | सफेद | हल्का पीला |
| प्रमुख उपयोग | सूती कपड़े, रूई, कागज | बोरा, रस्सी, डलिया, पर्दे |
| विशेष नाम | सफेद सोना (White Gold) | सोने का रेशा (Golden Fibre) |
| रेशे का प्रकार | उदाहरण | स्रोत / पौधे का भाग | विशेषता |
| पादप रेशे | रूई (कपास) | कपास — बीज से | मुलायम, सफेद, नमी सोखे |
| पादप रेशे | जूट | पटसन — तने से | मजबूत, पीला, टिकाऊ |
| पादप रेशे | फ्लैक्स | अलसी/तीसी — तने से | मजबूत, लिनेन कपड़ा |
| पादप रेशे | नारियल जटा | नारियल — फल से | मोटा, रस्सी-चटाई के लिए |
| जांतव रेशे | ऊन | भेड़, याक, ऊँट — बाल से | गर्म, मुलायम, सर्दियों के लिए |
| जांतव रेशे | रेशम | रेशम कीट — कोकून से | चमकीला, मजबूत, महँगा |
| संश्लेषित रेशे | नायलॉन, पॉलिएस्टर, रेयान | पेट्रोलियम — कारखाने में | टिकाऊ, जल्दी सूखे, कम खर्च |
BASIC SHIKSHA SOLUTION ● UP BOARD CLASS 6 SCIENCE SOLUTION
BASIC SHIKSHA SOLUTION ● UP BOARD CLASS 6 SCIENCE SOLUTION
Q1. पादप रेशे किसे कहते हैं?
पौधों के किसी भाग (तना, बीज, पत्ती, फल आदि) से प्राप्त किए जाने वाले प्राकृतिक रेशे पादप रेशे कहलाते हैं। रूई (बीज से), जूट (तने से), फ्लैक्स (तने से) और नारियल जटा (फल से) — ये प्रमुख पादप रेशे हैं।
Q2. कताई और बुनाई में क्या अंतर है?
कताई वह प्रक्रिया है जिसमें रेशों को खींचकर ऐंठन देकर मजबूत धागा बनाया जाता है — इसमें रेशा धागे में बदलता है। बुनाई वह प्रक्रिया है जिसमें धागों के दो सेट को आपस में विनत करके कपड़ा तैयार किया जाता है — इसमें धागा कपड़े में बदलता है।
Q3. कपास की खेती के लिए कौन सी मिट्टी चाहिए?
कपास की खेती के लिए काली मिट्टी (रेगर मिट्टी) सबसे उपयुक्त है। इसमें नमी बनाए रखने की विशेष क्षमता होती है। साथ ही 21°C से 27°C तापमान और सामान्य वर्षा की आवश्यकता होती है। भारत में महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु प्रमुख उत्पादक राज्य हैं।
Q4. जूट को "सोने का रेशा" क्यों कहते हैं?
जूट को "सोने का रेशा (Golden Fibre)" इसलिए कहते हैं क्योंकि इसके रेशे हल्के सुनहरे-पीले रंग के होते हैं। साथ ही यह किसानों के लिए बहुत आर्थिक महत्व का है — इससे बोरा, रस्सी, डलिया, पर्दे आदि बनाकर अच्छी आमदनी होती है। यह पर्यावरण के अनुकूल भी है।
Q5. Bt कपास क्या है?
Bt कपास (Bacillus thuringiensis Cotton) जैव-प्रौद्योगिकी द्वारा विकसित कपास की एक आधुनिक किस्म है जिसमें सैकड़ों टॉक्सिन उत्पन्न करने की क्षमता है। इससे फसल को कीट-पतंगों से बचाव होता है। देशी कपास की तुलना में इसकी उत्पादकता और गुणवत्ता दोनों अधिक होती हैं। पिछले 15 वर्षों से गुजरात, महाराष्ट्र, आन्ध्रप्रदेश में Bt कपास की खेती हो रही है।
Q6. वस्त्र का इतिहास संक्षेप में बताइए।
आरम्भिक मानव गुफाओं में रहता था — गर्म क्षेत्रों में वस्त्र की आवश्यकता नहीं थी। जब ठंडे क्षेत्रों में बसे तो पेड़ की पत्तियाँ, छाल और जंतुओं की खाल ओढ़ी। कृषि युग में घास और टहनियाँ बुनकर चटाइयाँ बनाईं और लताओं व बालों से धागे बनाए। भारतवासी गंगा किनारे उगाई मिस्री (कपास) के वस्त्र पहनते थे। सलाई की सुई के आविष्कार के बाद वस्त्र सिलकर पहने जाने लगे।
Q7. चरखे का क्या महत्व था?
स्वतंत्रता आंदोलन के समय राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने ब्रिटेन के मिलों में आयातित कपड़ों का बहिष्कार किया। उन्होंने चरखे द्वारा हाथ के कते धागों से बनी वस्तुओं को लोकप्रियता दी और इस प्रकार के वस्त्र को खादी नाम दिया। चरखा भारत के स्वाभिमान का प्रतीक बन गया और भारतीय ध्वज में भी चरखे को स्थान दिया गया।
Q8. हथकरघा और पावर लूम में क्या अंतर है?
हथकरघा (Handloom) वह करघा है जिसे हाथ और पैर से चलाया जाता है — गाँवों में बुनकर इससे सूती वस्त्र बनाते हैं। यह धीमा लेकिन कलात्मक होता है। पावर लूम (Power Loom) विद्युत चालित करघा है जिससे औद्योगिक स्तर पर बड़े पैमाने पर वस्त्र बनाए जाते हैं — यह तेज और सस्ता होता है।
इस प्रकार UP Board Class 6 Science इकाई 5 — तन्तु से वस्त्र तक के सम्पूर्ण समाधान में हमने जाना कि वस्त्र बनने की यात्रा तन्तु/रेशे से शुरू होती है। कपास और जूट दो प्रमुख पादप रेशे हैं जिन्हें उचित मिट्टी और जलवायु में उगाया जाता है। कताई से रेशों को धागे में बदला जाता है और बुनाई/बंधाई से धागों को वस्त्र में। रेटिंग पटसन से जूट प्राप्त करने की जैविक प्रक्रिया है। वस्त्र का इतिहास मानव सभ्यता के विकास का दर्पण है।
BASIC SHIKSHA SOLUTION ● UP BOARD CLASS 6 SCIENCE SOLUTION
सुझाव, सहयोग, लेटेस्ट अपडेट्स के लिए हमसे जुड़ें
~ Basic Shiksha Solution ~
- 👉 UP Board Class 6 Science Chapter 1 Solution
- 👉 UP Board Class 6 Science Chapter 2 Solution
- 👉 UP Board Class 6 Science Chapter 3 Solution
- 👉 UP Board Class 6 Science Chapter 4 Solution
- 👉 UP Board Class 6 Science All Chapters Solution
Comments
Post a Comment